शकुनि और उसके पासे

महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ जिसने कर्म की प्रधानता के साथ साथ अनेकों सीख भविष्य को दी हैं, जिनसे थोड़ा सा भी ज्ञान लेने पर मनुष्य अपने जीवन को बदल सकता है। अब तक महाभारत में हमने अनेकों पत्रों का वर्णन किया है, महाभारत में एक और पात्र था जिसने बूत ही मत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन यह भूमिका भी छल और अधर्म के मार्ग पर| जिसने अपने सम्प्पोर्ण सहयोग प्रदान तो किया लेकिन अधर्म और कुनीति को। हम बात कर रहे हैं, गांधार नरेश “शकुनि” की। शकुनि यूं तो गांधार देश का राजा था परन्तु गांधारी के विवाह के बाद से ही वो महाराज धृतराष्ट्र के राज्य में ही रहता था।

शकुनि का जीवन परिचय:

शकुनि गंधार साम्राज्य का राजा था। यह स्थान आज अफ़्ग़ानिस्तान में है। उलूक ,वृकासुर व वृप्रचिट्टी शकुनि तथा आरशी के पुत्र थे। वह हस्तिनापुर महाराज और कौरवों के पिता धृतराष्ट्र का साला था और कौरवों का मामा। दुर्योधन की कुटिल नीतियों के पीछे शकुनि का ही हाथ थाऔर वह कुरुक्षेत्र के युद्ध के लिए दोषियों में भी पूर्ण रूप से सम्मिलित है। उसने कई बार पाण्डवों के साथ छल किया और अपने भांजे दुर्योधन को पाण्डवों के प्रति कुटिल चालें चलने के लिए उकसाया।

शकुनि का जन्म गंधार के सम्राट सुबल तथा साम्राज्ञी सुदर्मा के यहाँ हुआ था। शकुनि की बहन गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हुआ था। शकुनि की कुरुवंश के प्रति घृणा का कारण यह था, की हस्तिनापुर के सेनापति भीष्म एक बार धृतराष्ट्र के लिए गांधारी का हाथ माँगने गंधार गए। तब गांधारी के पिता सुबल ने ये बात स्वीकार कर ली, लेकिन उस समय उन्हें ये पता नहीं था की धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधा है। इसका शकुनि ने भी विरोध किया, लेकिन गांधारी अब तक धृतराष्ट्र को अपना पति मान चुकी थीऔर क्यूंकि धृतराष्ट्र का अंधा होना उनके विवाह में रुकावट था, गांधारी ने भी अपनी आँख में पट्टी बाँध ली थी। इसलिए शकुनि ने उस दिन ये प्रण लिया की वह सम्पूर्ण कुरुवंश के सर्वनाश का कारण बनेगा।

महाभारत में चौसर का खेल:

हस्तिनापुर राज्य को दो बराबर टुकडो़ में बाँटकर एक भाग, जो की पुर्णतः बंजर था, पाण्डवों को दे दिया गया, जिसे उन्होनें अपने अथक प्रयासों से इंद्रप्रस्थ नामक सुंदर नगरी में परिवर्तित कर दिया। शीघ्र ही वहाँ की भव्यता कि चर्चाएँ दूर्-दूर तक होने लगीं। युधिष्ठिर द्वारा किए गए राजसूय यज्ञ के अवसर पर, दुर्योधन को भी उस भव्य नगरी में जाने का अवसर मिला। वह राजमहल की भव्यता देख रहा था। महल में जहाँ पर पानी दिखाई देता वहां पर भूमि होती,तो जहाँ पर द्वार दिखाई देता वहां पर दीवार। महल की इस भव्यता को दुर्योधन देख ही रहा था कि एक स्थान पर उसने पानी की तल वाली सजावट को ठोस भूमि समझ लिया और पानी मे गिर गया। यह देखकर द्रौपदी हंसने लगी और उसने दुर्योधन को “अंधे का पुत्र अंधा” कहा और ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी। इसे दुर्योधन ने अपना अपमान समझा और वह हस्तिनापुर लौट आया।

अपने भांजे की यह मानसिक स्थिति भाँपकर, शकुनि ने मन में पाण्डवों का राजपाट छिनने का कुटिल विचार आया। उसने पाण्डवों को चौसर के खेल के लिए आमंत्रित किया और अपनी कुटिल बुद्धि के प्रयोग से युधिष्ठिर को पहले तो छोटे-छोटे दाव लगाने के लिए कहा। जब युधिष्ठिर खेल छोड़ने का मन बनाता तो शकुनि द्वारा कुछ ना कुछ कहकर युधिष्ठिर से कोई ना कोई दाव लगवा लेता। इस प्रकार महाराज युधिष्ठिर एक-एक कर अपनी सभी वस्तुओं को दाव पर लगा कर हारते रहे और अंत में उन्होनें अपने भाईयों और अपनी पत्नी को भी दाव पर लगा दिया और उन्हें भी हार गए और इस प्रकार द्रौपदी का अपमान करके दुर्योधन ने अपना प्रतिशोध ले लिया और उसी दिन महाभारत के युद्ध की नींव पडी़।

शकुनि के पासों का रहस्य:

यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि शकुनि के पास जुआ खेलने के लिए जो पासे हुआ करते थे वह उसके मृत पिता के रीढ़ की हड्डी के थे। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात शकुनि ने उनकी कुछ हड्डियां अपने पास रख ली थीं। शकुनि जुआ खेलने में पारंगत था और उसने कौरवों में भी जुए के प्रति मोह जगा दिया था।

शकुनि की इस चाल के पीछे सिर्फ पांडवों का ही नहीं बल्कि कौरवों का भी भयंकर विनाश छिपा था, क्योंकि शकुनि ने कौरव कुल के नाश की सौगंध खाई थी और उसके लिए उसने दुर्योधन को अपना मोहरा बना लिया था। शकुनि हर समय बस मौकों की तलाश में रहता था, लाक्षागृह और चौसर का खेल शकुनि ही बुद्धि थी, जिसके चलते कौरव और पांडवों में भयंकर युद्ध छिड़ें और कौरव मारे जाएं।

जब युधिष्ठिर हस्तिनापुर का युवराज घोषित हुआ, तब शकुनि ने ही लाक्षागृह का षड्‍यंत्र रचा और सभी पांडवों को वारणावत में जिंदा जलाकर मार डालने का प्रयत्न किया। शकुनि किसी भी तरह दुर्योधन को हस्तिनापुर का राजा बनते देखना चाहता था ताकि उसका दुर्योधन पर मानसिक आधिपत्य रहे और वह दुर्योधन की सहायता से भीष्म और कुरुकुल का विनाश कर सके अतः उसने ही पांडवों के प्रति दुर्योधन के मन में वैरभाव जगाया और उसे सत्ता के प्रति आसक्त बना दिया।

ऐसा भी कहा जाता है कि शकुनि के पासे में उसके पिता की आत्मा वास कर गई थी जिसकी वजह से वह पासा शकुनि की ही बात मानता था। कहते हैं कि शकुनि के पिता ने मरने से पहले शकुनी से कहा था कि मेरे मरने के बाद मेरी हड्डियों से पासा बनाना, ये पासे हमेशा तुम्हारी आज्ञा मानेंगे, तुमको जुए में कोई हरा नहीं सकेगा। हालांकि इस कथा का वर्णन महाभारत में नहीं मिलता कुछ प्रचलित लोक कथाओं में इस बार का वर्णन मिलता है की शकुनि के पिता की हड्डियों से वे पास निर्मित थे।

यह भी कहा जाता है कि शकुनि के पासे के भीतर एक जीवित भंवरा था जो हर बार शकुनि के पैरों की ओर आकर गिरता था। इसलिए जब भी पासा गिरता वह छ: अंक दर्शाता था। शकुनि भी इस बात से वाकिफ़ था इसलिए वह भी छ: अंक ही कहता था। शकुनि का सौतेला भाई मटकुनि इस बात को जानता था कि पासे के भीतर भंवरा है।

हालांकि शकुनि की बदले की भावना कि इस कहानी का वर्णन वेदव्यास कृत महाभारत में नहीं मिलता है। यह कहानी लोककथा और जनश्रुतियों पर आधारित है कि उसके परिवार को धृतराष्ट्र ने जेल में डाल दिया था जहां उसके माता, पिता और भाई भूख से मारे गए थे। बहुत से विद्वानों का मत है कि शकुनि के पासे हाथीदांत के बने हुए थे। शकुनि मायाजाल और सम्मोहन की मदद से पासो को अपने पक्ष में पलट देता था। जब पांसे फेंके जाते थे तो कई बार उनके निर्णय पांडवों के पक्ष में होते थे, ताकि पांडव भ्रम में रहे कि पासे सही है।जाइए की चौसर के खेल में भी हुआ था, खेल के प्रारम्भ में शकुनि ने साड़ी बाजियां पांडवों के पक्ष में रखी जिससे उनके भीतर खेल के प्रति लोलुपता और भी बढ़ती गयी, और अंततः अपने भाइयों और पत्नी को दांव में लगाने से पहले भी धृतराष्ट्र अपने आप को खेल के मोह से नहीं बचा सके।

शकुनि के जीवन में बारे में महाभारत से बहुत ज़्यादा जानकारी प्राप्त नहीं होती, महाभारत में उसके छल कपट का ही वर्णन मिलता है।शकुनि ही था जिसने युद्ध के सभी नियमों का उल्लंघन करने की सीख दुर्योधन को दी थी।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में शकुनि का वध सहदेव के द्वारा 18 वें दिन के युद्ध में किया गया। उसके सभी भाइयों का वध इरवन और अर्जुन के द्वारा किया गया।

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