फूलदेई 2022 – फूलदेई का त्यौहार कैसे मनाया जाता है?

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फूलदेई का त्यौहार भारत के उत्तराखण्ड राज्य का एक स्थानीय त्यौहार है, जो कि चैत्र मास की संक्रान्ति को मनाया जाता है। इस त्यौहार को “फूल संक्राति” के नाम से भी जाना जाता है। यह बसंत ऋतु के आगमन का और प्रकृति से जुड़ा हुआ त्यौहार है। बच्चे इस त्यौहार के आने का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं, और इस दिन काफी उत्साहित भी रहते हैं। इस चैत्र महीने के प्रारम्भ होते ही तरह तरह के फूल खिल जाते हैं। इसमें जंगली फूलों में प्योली/फ्यूंली, बुरांस, बासिंग, हिसर इत्यादि शामिल हैं। जंगली फूलों के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों का भी अपना महत्त्व है।

फूलदेई को विशेष रूप से बच्चों के द्वारा बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। बच्चों के अलावा अन्य लोगों के द्वारा भी इस त्यौहार को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस त्यौहार को शहरी इलाकों और विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

फूलदेई का त्यौहार कब मनाया जाता है?

फूलदेई का त्यौहार चैत्र मास की संक्रान्ति को मनाया जाता है, जो कि चैत्र महीने के प्रथम दिन मनाया जाता है। इस दिन छोटे बच्चे सुबह उठते ही प्योली/फ्यूंली, बुरांस, बासिंग इत्यादि फूलों के साथ साथ सरसों, आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को जंगल से लाते हैं, और इस प्रकार फूलदेई त्यौहार की शुरुआत हो जाती है। इसके अलावा फूलदेई त्यौहार को कैसे मनाया जाता है इसके बारे में विस्तार से नीचे दिया गया है।

फूलदेई का त्यौहार कैसे मनाया जाता है?

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घर की गृहणियां पहले से ही गाय के गोबर से घर की देहरी को लीप के रखती है। फूलदेई त्यौहार के दिन बच्चे सुबह उठकर फ्यूंली, बुरांश, बासिंग, कचनार, सरसों, आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को जंगल से लाकर इकट्ठा करते हैं। इन फूलों को रिंगाल की टोकरी में सजाया जाता है। टोकरी में फूलों के साथ गुड़, चावल, हरे पत्ते और नारियल रखकर बच्चे गांव के घर की देहरी पर बिखेरकर उस घर की खुशहाली के लिए दुआएं मांगते हैं।

इस दौरान एक गाना भी गाया जाता है- फूलदेई, छम्मा देई। जतुकै देला, उतुकै सही। दैणी द्वार, भर भकार। यो देई कैं बारम्बार नमस्कार। यानि कि भगवान देहरी के इन फूलों से सबकी रक्षा करें और घरों में अन्न के भंडार कभी खाली न होने दें।

जिसके फलस्वरुप घर के मुखिया द्वारा उनको चावल, आटा या अन्य कोई अनाज और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। बच्चे इन छावा, आटा, अनाज, पैसो को अपने घर ले जाते हैं और इनसे रात को घर में त्यौहार मनाया जाता है। बच्चों के अलावा इस त्यौहार को अन्य लोगों के द्वारा भी मनाया जाता है जिसमे लोग हरेले की टोकरियों की पूजा करते हैं और फिर इसे विसर्जित कर दिया जाता है। इस दिन पारम्परिक पकवान ‘साई’ को बनाकर लोगों के बीच बांटने की परम्परा है।

फूलदेई को क्यों मनाया जाता है?

इस त्यौहार में समाज की उन्नति और संपन्नता के लिए भगवान से प्रार्थना की जाती है।

फूलदेई से सम्बंधित लोककथाएं काफी प्रचलित है जो इस प्रकार हैं:

फ्यूंली नामक एक वनकन्या थी जो जंगल में रहा करती थी। जंगल के पेड़ पौधे और जानवर ही उसका परिवार और दोस्त सब कुछ थे। फ्यूंली की वजह से जंगल और पहाड़ों में हरियाली और खुशहाली थी। एक दिन दूर देश का राजकुमार जंगल में पहुंचा और उस राजकुमार से फ्यूंली को प्रेम हो गया। राजकुमार के कहने पर फ्यूंली ने उससे शादी कर ली और पहाड़ों को छोड़कर उसके साथ महल चली गई।

फ्यूंली के जाते ही पेड़-पौधे मुरझाने लगे, नदियां सूखने लगीं और पहाड़ बरबाद होने लगे। उधर महल में फ्यूंली ख़ुद बहुत बीमार रहने लगी। उसने राजकुमार से उसे वापस अपने जंगल छोड़ देने की विनती की, लेकिन राजकुमार उसे छोड़ने को तैयार नहीं था और एक दिन फ्यूंली मर गई। मरते-मरते उसने राजकुमार से गुज़ारिश की, कि उसका शव पहाड़ में ही कहीं दफना दे।

फ्यूंली का शरीर राजकुमार ने पहाड़ की उसी चोटी पर जाकर दफनाया जहां से वो उसे लेकर आया था। जिस जगह पर फ्यूंली को दफनाया गया, कुछ महीनों बाद वहां एक फूल खिला, जिसे फ्यूंली नाम दिया गया। इस फूल के खिलते ही पहाड़ फिर हरे होने लगे, नदियों में पानी फिर लबालब भर गया, पहाड़ की खुशहाली फ्यूंली के फूल के रूप में लौट आई।

इसी फ्यूंली के फूल से द्वारपूजा करके बच्चे और लड़कियां फूलदेई में अपने घर और पूरे गांव की खुशहाली की दुआ करती हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव शीतकाल में अपनी तपस्या में लीन थे। ऋतु परिवर्तन के कई वर्ष बीत गए लेकिन, फिर भी भगवान शिव की तंद्रा नहीं टूटी। ऐसे में मां पार्वती, नंदी-शिवगण और संसार के कई वर्ष शिव के तंद्रालीन होने से बेमौसमी हो गए। आखिरकार, शिव की तंद्रा तोड़ने के लिए पार्वती ने युक्ति निकाली और शिव भक्तों को पीतांबरी वस्त्र पहनाकर उन्हें अबोध बच्चों का स्वरूप दे दिया।

फिर सभी देव क्यारियों में ऐसे पुष्प चुनकर लाए, जिनकी खुशबू पूरे कैलाश में महक उठी। पुष्पों को सबसे पहले शिव के तंद्रालीन मुद्रा को अर्पित किया गया, जिसे फूलदेई कहा गया। भगवान शिव की तंद्रा टूटी लेकिन, सामने बच्चों के वेश में शिवगणों को देखकर उनका क्रोध शांत हो गया, जिससे सब कुछ सामान्य हो गया और फिर भगवान शिव ने भी सबके साथ इस त्यौहार को मनाया। तब से ही विशेष रूप से बच्चों द्वारा फूलदेई को मनाये जाने की परम्परा है।

फूलदेई के अन्य नाम

इस त्यौहार को कुमाऊं में फूलदेई के नाम से और गढ़वाल में फूल संक्राति के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा जौनसार बावर में इसे गोगा के नाम से जाना जाता है। इस दिन घर की देहरी पर फूल डालने वाले बच्चों को फुलारी कहते हैं।

फूलदेई त्यौहार का महत्व

फूलदेई त्यौहार का उत्तराखंड में एक विशेष महत्त्व है। बसंत ऋतु के स्वागत के लिए इस पर्व को मनाया जाता है। इसे प्रकृति के सम्मान के पर्व के रूप में देखा जाता है। इस दिन घरों की देहरी पर फूल डाले जाते हैं और लोगों के लिए सुख शांति की कामना की जाती है। फूलदेई के दिन से प्रकृति पूरी हरी-भरी नजर आती है और अनेक फूल खिल जाते हैं। फूलदेई के माध्यम से पहाड़, पेड़-पौधों, फूल-पत्तियों और नदियों से प्रेम करने की सीख दी जाती है। इस प्रकार की लोक संस्कृति व लोक परंपराओं से बच्चों का अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपरा से जुड़ाव होता है।

निष्कर्ष

आज के समय में पर्यावरण प्रदूषण एक अहम मुद्दा बन गया है। जैसे जैसे साल बीत रहे हैं, प्रदूषण भी बढ़ता ही जा रहा है। हांलाकि सरकार के द्वारा इसके रोकथाम के लिए कईं उपाय किये जा रहे हैं लेकिन अभी भी सभी लोग इसके लिए जागरूक नहीं है। फूलदेई का त्यौहार हमे प्रकृति के महत्त्व को बताता है और यह सोचने में मजबूर कर देता है कि अगर प्रकृति है तो हम हैं, प्रकृति नहीं तो हम भी नहीं।

इस प्रकार यह त्यौहार हमको प्रकृति संरक्षण के लिए एक अच्छा सन्देश देता है। हमको भी आज से यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति के साथ कभी भी खिलवाड़ नहीं करेंगे और पर्यावरण प्रदूषण के रोकथाम के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।

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