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Gudi Padwa 2021 Date, Time – गुड़ी पड़वा पर्व कैसे मनाते हैं?

Gudi Padwa – गुड़ी पड़वा

संक्षिप्त परिचय

गुड़ी पड़वा (Gudi Padwa) का पर्व चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस दिन से हिन्दू नव वर्ष आरंभ होता है। इसे वर्ष प्रतिपदा या उगादि (ugadi) भी कहा जाता है। गुड़ी का अर्थ है विजय पताका, तो वहीं पड़वा प्रतिपदा तिथि को कहा जाता है। इसीलिये इस दिन लोग घरों में गुड़ी फहराते हैं। आम के पत्तों की बंदनवार से घरों को सजाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था।

इसी दिन से नया संवत्सर भी शुरु होता है। अत: इस तिथि को ‘नवसंवत्सर’ यानि नए साल के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का आरंभ भी होता है। यह आंध्र प्रदेश व महाराष्ट्र में विशेष रूप से लोकप्रिय पर्व है। कहा जाता है कि महाभारत में युधिष्ठिर का राज्यरोहण इसी दिन हुआ था और इसी दिन विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया था। किसान इसे रबी के चक्र के अंत के तौर पर भी मनाते हैं।

चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा वसन्त ऋतु में आती है। इस ऋतु में सम्पूर्ण सृष्टि में सुन्दर छटा बिखर जाती है। विक्रम संवत के महीनों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदय और अस्त होने के आधार पर रखे गए हैं। सूर्य, चन्द्रमा की गति के अनुसार ही तिथियाँ भी उदय होती हैं। मान्यता है कि इस दिन दुर्गा जी के आदेश पर श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इस दिन दुर्गा जी के मंगलसूचक घट की स्थापना की जाती है।

धार्मिक दृष्टि से फल, फूल, पत्तियाँ, पौधों तथा वृक्षों का विशेष महत्व है। चैत्र मास में पेड़-पौधों पर नई पत्तियों आ जाती हैं तथा नया अनाज भी आ जाता है जिसका उपयोग सभी देशवासी वर्ष भर करते हैं, उसको नजर न लगे, सभी का स्वास्थ्य उत्तम रहे, पूरे वर्ष में आने वाले सुख-दुःख सभी मिलकर झेल सकें ऐसी कामना ईश्वर से करते हुए नए वर्ष और नए संवत्सर के स्वागत का प्रतीक है गुड़ी पड़वा (Gudi Padwa)

Gudi Padwa 2021 Date, Time – गुड़ी पड़वा 2021 तिथि, मुहूर्त

गुड़ी पड़वा 2021 तिथि:13 अप्रैल, 2021 (मंगलवार)
प्रतिपदा तिथि आरम्भअप्रैल 12, 2021 को 08:02:25 से
प्रतिपदा तिथि समाप्तअप्रैल 13, 2021 को 10:18:32 पर

गुड़ी पड़वा से जुडी पौराणिक कथा

दोस्तों, दक्षिण भारत में गुड़ी पड़वा का त्यौहार काफी लोकप्रिय है। पौराणिक मान्यता के मुताबिक सतयुग में दक्षिण भारत में राजा बालि का शासन था। जब भगवान श्री राम को पता चला की लंकापति रावण ने माता सीता का हरण कर लिया है तो उनकी तलाश करते हुए जब वे दक्षिण भारत पहुंचे तो यहां उनकी उनकी मुलाकात सुग्रीव से हुई।

सुग्रीव ने श्रीराम को बालि के कुशासन से अवगत करवाते हुए उनकी सहायता करने में अपनी असमर्थता जाहिर की। इसके बाद भगवान श्री राम ने बालि का वध कर दक्षिण भारत के लोगों को उसके आतंक से मुक्त करवाया। मान्यता है कि वह दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का था। इसी कारण इस दिन गुड़ी यानि विजय पताका फहराई जाती है।

एक अन्य कथा

एक अन्य कथा के मुताबिक शालिवाहन ने मिट्टी की सेना बनाकर उनमें प्राण फूंक दिये और दुश्मनों को पराजित किया। इसी दिन शालिवाहन शक का आरंभ भी माना जाता है। इस दिन लोग आम के पत्तों से घर को सजाते हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व महाराष्ट्र में इसे लेकर काफी उल्लास होता है।

गुड़ी पाड़वा के प्रारम्भ होने पर क्या करें?

  • नया संवत्सर प्रारम्भ होने पर भगवान की पूजा करके प्रार्थना करनी चाहिए।
  • दुर्गा जी की पूजा के साथ नूतन संवत्‌ की पूजा करें।
  • घर को ध्वजा, पताका, तोरण, बंदनवार, फूलों आदि से सजाएँ व अगरबत्ती, धूप आदि से सुगंधित करें।
  • दिनभर भजन-कीर्तन कर शुभ कार्य करते हुए आनंदपूर्वक दिन बिताएँ।
  • कलश स्थापना और नए मिट्टी के बरतन में जौ बोए और अपने घर में पूजा स्थल में रखें।
  • स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिए नीम की कोंपलों के साथ मिश्री खाने का भी विधान है। इससे रक्त से संबंधित बीमारी से मुक्ति मिलती है।
  • सभी जीव मात्र तथा प्रकृति के लिए मंगल कामना करें।
  • नीम की पत्तियाँ खाएँ भी और खिलाएँ भी।
  • ब्राह्मण की अर्चना कर लोकहित में प्याऊ स्थापित करें।
  • इस दिन नए वर्ष का पंचांग या भविष्यफल ब्राह्मण के मुख से सुनें।
  • इस दिन से दुर्गा सप्तशती या रामायण का नौ-दिवसीय पाठ आरंभ करें।
  • आज से परस्पर कटुता का भाव मिटाकर समता-भाव स्थापित करने का संकल्प लें।

गुड़ी पड़वा का महत्व (नववर्ष की शुरुआत का महत्व)

नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियाँ मार्च और अप्रैल के महीने में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह से ही नववर्ष की शुरुआत मानता है और इसे नव संवत्सर के रूप में जाना जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी (ugadi), चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।

  • इस विक्रम संवत में नववर्ष की शुरुआत चंद्रमास के चैत्र माह के उस दिन से होती है जिस दिन ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी।
  • इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है।
  • इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था।
  • इसी दिन से नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है।
  • इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी।
  • इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।
  • ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।
  • इस दिन बर्तन पर भी स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर रखा जाता है।
  • लोग इस दिन पारंपरिक वेषभूषा धारण करते हैं।
  • माना जाता है कि गुड़ी लगाने से घर में समृद्धि आती है।
  • गुड़ी पाड़वा के दिन सूर्यदेव की आराधना को महत्व दिया जाता है।
  • सूर्यदेव के अलावा इस दिन सुंदरकांड, रामरक्षास्त्रोत, देवी भगवती के मंत्रों का जाप भी किया जाता है।
  • किसान रबी की फ़सल की कटाई के बाद पुनः बुवाई करने की ख़ुशी में इस त्यौहार को मनाते हैं। अच्छी फसल की कामना के लिए इस दिन वे खेतों को जोतते भी हैं।

गुड़ी पाड़वा पर्व कैसे मनाते हैं? (नववर्ष मनाने की परंपरा)

रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है।

  • हिंदू लोग इस दिन गुड़ी का पूजन करते हैं
  • नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है।
  • घर को ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है।
  • पर्व की खुशी में विभिन्न क्षेत्रों में विशेष प्रकार के व्यंजन भी तैयार किये जाते हैं।
  • पूरनपोली नाम का मीठा व्यंजन इस पर्व की खासियत है। महाराष्ट्र में श्रीखंड भी विशेष रूप से बनाया जाता है। वहीं आंध्रा में पच्चड़ी को प्रसाद रूप मे बनाकर बांटने का प्रचलन भी गुड़ी पाड़वा के पर्व पर है।
  • बेहतर स्वास्थ्य की कामना के लिये नीम की कोपलों को गुड़ के साथ खाने की परंपरा भी है। मान्यता है कि इससे सेहत ही नहीं बल्कि संबंधों की कड़वाहट भी मिठास में बदल जाती है।
  • ब्राह्मण, कन्या, गाय, कौआ और कुत्ते को भोजन कराया जाता है।
  • सभी एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं। एक दूसरे को तिलक लगाते हैं। मिठाइयाँ बाँटते हैं। नए संकल्प लिए जाते हैं।

गुड़ी पड़वा के पूजन-मंत्र

गुड़ी पड़वा (Gudi Padwa) पर पूजा के लिए आगे दिए हुए मंत्र पढ़े जा सकते हैं। कुछ लोग इस दिन व्रत-उपवास भी करते हैं।

प्रातः व्रत संकल्प:

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्रह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे अमुकनामसंवत्सरे चैत्रशुक्ल प्रतिपदि अमुकवासरे अमुकगोत्रः अमुकनामाऽहं प्रारभमाणस्य नववर्षस्यास्य प्रथमदिवसे विश्वसृजः श्रीब्रह्मणः प्रसादाय व्रतं करिष्ये।

शोडषोपचार पूजा संकल्प:

ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्रह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे अमुकनामसंवत्सरे चैत्रशुक्ल प्रतिपदि अमुकवासरे अमुकगोत्रः अमुकनामाऽहं प्रारभमाणस्य नववर्षस्यास्य प्रथमदिवसे विश्वसृजो भगवतः श्रीब्रह्मणः षोडशोपचारैः पूजनं करिष्ये।

पूजा के बाद व्रत रखने वाले व्यक्ति को इस मंत्र का जाप करना चाहिए–

ॐ चतुर्भिर्वदनैः वेदान् चतुरो भावयन् शुभान्।
ब्रह्मा मे जगतां स्रष्टा हृदये शाश्वतं वसेत्।।

विभिन्न स्थलों में गुड़ी पड़वा पर्व का आयोजन

देश में अलग-अलग जगहों पर गुड़ी पड़वा पर्व को भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है।

  • गोवा और केरल में कोंकणी समुदाय इसे संवत्सर पड़वो नाम से मनाता है।
  • कर्नाटक में यह पर्व युगाड़ी नाम से जाना जाता है।
  • आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में गुड़ी पड़वा को उगाड़ी (ugadi) नाम से मनाते हैं।
  • कश्मीरी हिन्दू इस दिन को नवरेह के तौर पर मनाते हैं।
  • मणिपुर में यह दिन सजिबु नोंगमा पानबा या मेइतेई चेइराओबा कहलाता है।
  • इस दिन चैत्र नवरात्रि भी आरम्भ होती है।

गुड़ी पड़वा से जुडी खास बातें

  • गुड़ी पड़वा को महाराष्ट्रियन लोग नये साल की शुरुआत मानते हैं। इस दिन लोग नयी फसल की पूजा करते हैं।
  • गुड़ी पड़वा के दिन लोग अपने घरों की विशेष साफ-सफाई करने के बाद घरों में रंगोली बनाते हैं। आम के पत्तों से बंदनवार बनाकर सभी घरों के आगे लगाते हैं। महिलाएं घरों के बाहर सुदंर और आकर्षक गुड़ी लगाती हैं।
  • गुड़ी पड़वा के मौके पर खासतौर पर पूरन पोली नामक पकवान बनता है। यानि मीठी रोटी, इसे गुड और नीम, नमक, इमली के साथ बनाया जाता है।
  • ऐसा माना जाता है कि गुड़ी को घर में लाने से बुरी आत्मा दूर रहती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है।
  • पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन रावण को हराने के बाद भगवान राम अयोध्या लौटे थे।
  • विक्रम संवत हिंदू पंचांग के अनुसार इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया था।
  • वीर मराठा छत्रपति शिवाजी जी ने युद्ध जीतने के बाद पहली बार गुड़ी पड़वा को मनाया था। इसी के बाद हर साल मराठी लोग इस परंपरा का अनुसरण करते हैं।
  • अधिकतर लोग इस दिन कड़वे नीम की पत्तियों को खाकर दिन की शुरूआत करते हैं। कहा जाता है कि गुड़ी पड़वा पर ऐसा करने से खून साफ होता है और शरीर मजबूत बनता है।
  • इस दिन को विभिन्न राज्यों में उगादी (ugadi), युगादी, छेती चांद आदि अलग-अलग नामों से मनाया जाता है।
  • इस दिन सोना, वाहन या मकान की खरीद या किसी काम की शुरुआत करना शुभ माना जाता है।

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