सहदेव के बारे में ये बातें क्या आप जानते हैं?

महाभारत की कहानी पांचो पांडव और कौरवों के धर्मयुद्ध की कहानी है। महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक हैं “सहदेव”। सहदेव पांचो पांडवों में सबसे छोटे थे,परन्तु युद्ध कला में उतने ही निपुण| सहदेव राजा पाण्डु और माता माद्री के पुत्र थे। जब नकुल एवं सहदेव का जन्म हुआ था तो आकाशवाणी हुई थी की शक्ति और रूप में ये दोनों जुड़वाँ बंधू,स्वयं जुड़वाँ अश्विनी कुमार से भी बढ़कर होंगे। आइये जानते हैं सहदेव से जुडी कुछ दिलचस्प बातें:

1. सहदेव अपने जुड़वाँ भाई नकुल एवं पिता पाण्डु की तरह पशुओं की देख-रेख में और चिकित्सा में दक्ष थे। मृत्यु के समय सहदेव की उम्र 105 वर्ष की थी।

2. महाभारत के युद्ध में सहदेव के अश्व तीतर के रंग के थे और उनके रथ पर हंस का ध्वज लहराता था|सहदेव एक अच्छे रथ योद्धा माने जाते हैं।

3. सहदेव की कुल चार पत्नियां थी: द्रौपदी,विजया, भानुमति एवं जरासंध की पुत्री।

4. सहदेव को द्रौपदी से “श्रुतकर्मा” और विजया से “सुभद्र” पुत्र की प्राप्ति हुई थी।

5. सहदेव के २ पुत्र और थे जिनमे से एक का “सोमक” सहदेव के नाम से पड़ा था।

6. हम में से ये बात बहुत काम लोग जानते हैं की सहदेव “त्रिकालदर्शी” थे। उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य से ही युद्ध कौशल और ज्योतिष विद्या का ज्ञान प्राप्त किया था। भविष्य में होने वाली हर घटना का उन्हें पहले से ही ज्ञान था। वो चाहते तो महाभारत युद्ध से होने वाले परिणाम को सबको बताकर वो सबको आगाह कर सकते थे| लेकिन वो ऐसा ना कर सके, क्यूंकि भगवान् श्री कृष्णा ने उन्हें श्राप दिया था की अगर वो किसी को भी भविष्य के बारे में बताएँगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी।

7. ऐसा माना जाता है की युद्ध प्रारम्भ होने से पहले दुर्योधन सहदेव के पास गए थे, युद्ध के लिए शुभ मुहूर्त जानने के लिए। सहदेव जानते थे कि दुर्योधन उनका सबसे बड़ा दुश्मन है तब भी उन्होंने दुर्योधन को युद्ध का सही मुहूर्त बताकर अपने भातृ धर्म का पालन किया।

8. भारत के इतिहास में सहदेव के नाम से तीन ग्रन्थ प्राप्त होते हैं: “व्याधि साध विवर्दन”, “अग्नि श्रोत” एवं “शकुनपरीक्षा”.

9.सहदेव के त्रिकालदर्शी होने का प्रमाण महाभारत में नहीं मिलता परन्तु दक्षिण भारत की लोक कथाओं में इसका वर्णन मिलता है।

आइये आगे जानते हैं कैसे सहदेव बने त्रिकालदर्शी:

सहदेव के पिता पाण्डु बहुत ही ज़्यादा ज्ञानी थे। उनकी अंतिम इच्छा थी की उनके मृत शरीर का सेवन उनके पाँचों पुत्रों द्वारा किया जाए, जिससे जो कुछ भी उन्होंने अर्जित किया है वो उनके पुत्रों में भी विसरित हो जाए| सहदेव की एकमात्र पुत्र थे जिन्होंने बहुत ही हिम्मत कर अपने पिता की इस इच्छा का मान रखने हेतु अपने पिता के मष्तिस्क के 3 हिस्से खाये।

  • पहला टुकड़ा खाते ही सहदेव को इतिहास का ज्ञान प्राप्त हुआ।
  • दूसरे टुकड़े को खाने पर सहदेव को वर्तमान का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ।
  • तीसरा टुकड़ा खाते ही सहदेव को भविष्य अपनी आँखों के सामने दिखने लगा था। कहा जाता है बाकी सभी पांडवों को श्री कृष्णा द्वारा रोक दिया गया था।

और इस प्रकार अपने पिता की इच्छा पूर्ण करने की वजह से सहदेव त्रिकालदर्शी हुए।

10. पाँचों पांडवों ने अपने राज्य का विस्तार भारत के अलग अलग हिस्सों में किया था। सहदेव ने अपने राज्य का विस्तार दक्षिण दिशा की ओर किया था, जिसके लिए उन्होंने दक्षिण भारत के समुद्री तटवर्ती राजाओं को परास्त किया था।

11. उन्होंने “सुरपाक” , “दण्डक”, “मलेच्छ”, “निषाद” , “पुरुषाद” नामक पर्वत और “त्रिमिलिंग” आदि राजाओं के राज्य को अपने अधीन कर लिया था।

स्वर्गारोहण के समय सहदेव सशरीर स्वर्ग नहीं जा पाए थे क्यूंकि उन्हें अपने ज्ञान और रूप पर अभिमान था और इस प्रकार 105 वर्ष की आयु के पश्चात् सहदेव ने शरीर त्याग मृत्यु का आलंगन किया था।

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