Categories: Rajasthan

राजस्थान में स्थित प्रमुख अभिलेख

1. बड़ली का शिलालेख

  • अजमेर जिले के बड़ली गांव में 443 ईसवी पूर्व का शिलालेख वीर सम्वत 84 और विक्रम सम्वत 368 का है
  • यह अशोक से भी पहले ब्राह्मी लिपि का है।
  • राजस्थान तथा ब्राह्मी लिपि का सबसे प्राचीन शिलालेख है
  • यह अभिलेख गौरीशंकर हीराचंद ओझा को भिलोत माता के मंदिर में मिला था
  • यह राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख है जो वर्तमान में अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित है

2. घोसुंडी शिलालेख (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व)

  • यह लेख कई शिलाखण्डों में टूटा हुआ है। इसके कुछ टुकड़े ही उपलब्ध हो सके हैं।
  • इसमें एक बड़ा खण्ड उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।
  • घोसुंडी का शिलालेख नगरी चित्तौड़ के निकट  घोसुण्डी गांव में प्राप्त हुआ था
  • इस लेख में प्रयुक्त की गई भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है।
  • घोसुंडी का शिलालेख सर्वप्रथम डॉक्टर डी आर भंडारकर द्वारा पढ़ा गया
  • यह राजस्थान में वैष्णव या भागवत संप्रदाय से संबंधित सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख है
  • इस अभिलेख से ज्ञात होता है कि उस समय तक राजस्थान में भागवत धर्म लोकप्रिय हो चुका था इसमें भागवत की पूजा के निमित्त शिला प्राकार बनाए जाने का वर्णन है
  • इस लेख में संकर्षण और वासुदेव के पूजागृह के चारों ओर पत्थर की चारदीवारी बनाने और गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने का उल्लेख है।
  • इस लेख का महत्त्व द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में भागवत धर्म का प्रचार, संकर्शण तथा वासुदेव की मान्यता और अश्वमेघ यज्ञ के प्रचलन आदि में है।

3. बिजोलिया शिलालेख

  • बिजोलिया के पाश्वर्नाथ जैन मंदिर के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण 1170 ई. के इस शिलालेख को जैन श्रावक लोलाक द्वारा मंदिर के निर्माण की स्मृति में बनवाया गया था
  • इसका प्रशस्ति कार गुण भद्र था
  • इस अभिलेख में सांभर एवं अजमेर के चौहानों का वर्णन है
  • इस लेख में उस समय  के क्षेत्रों के प्राचीन नाम भी मिलते हैं- जैसे एक जबालीपुर(जालौर), नड्डूल (नाडोल), शाकंभरी(सांभर), दिल्लिका (दिल्ली), श्रीमाल(भीनमाल), मंडलकर (मांडलगढ़), विंध्यवल्ली(बिजोलिया), नागहृद(नागदा) आदि।
  • इस लेख में उस समय दिए गए भूमि अनुदान का वर्णन डोहली नाम से किया गया है ।
  • बिजोलिया के आसपास के पठारी भाग को उत्तमाद्री के नाम से संबोधित किया गया  जिसे वर्तमान में उपरमाल के नाम से जाना जाता है ।
  • यह अभिलेख संस्कृत भाषा में है और इसमें 13 पद्य है यह लेख दिगंबर लेख है।
  • गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 12 वीं सदी के जनजीवन ,धार्मिक अवस्था और भोगोलिक और राजनीति अवस्था जानने हेतु यह लेख बड़े महत्व का है।
  • इस शिलालेख से कुटीला नदी के पास अनेक शैव व जैन तीर्थ स्थलों का पता चलता है ।

4. रणकपुर प्रशस्ति ( 1439 ई. )

  • इसका प्रशस्तिकार देपाक था
  • इसमें मेवाड़ के राजवंश एवं धरणक सेठ के वंश का वर्णन मिलता है
  • इसमें बप्पा एवं कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया है
  • इसमें महाराणा कुंभा की वीजीयो एवं उपाधियों का वर्णन है
  • इसमें गुहीलो को बप्पा रावल का पुत्र बताया है
  • इस लेख में बप्पा से कुंभा तक की वंशावली दी है। जिसमें बप्पा को गुहिल का पिता माना गया है।

5. कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति ( 1460 में )

  • इसका प्रशस्ति कार महेश भट्ट था
  • यह राणा कुंभा की प्रशस्ति है
  • इसमें बप्पा से लेकर राणा कुंभा तक की वंशावली का वर्णन है
  • इसमें कुंभा की उपलब्धियों एवं उसके द्वारा रचित ग्रंथों का वर्णन मिलता है
  • प्रशस्ति में चंडी शतक, गीत गोविंद की टीका संगीत राज आदि ग्रंथों का उल्लेख हुआ है

6. मानमोरी अभिलेख (713 ई.)

  • यह लेख चित्तौड़ के पास मानसरोवर झील के तट से कर्नल टॉड को मिला था।
  • चित्तौड़ की प्राचीन स्थिति एवं मोरी वंश के इतिहास के लिए यह अभिलेख उपयोगी है।
  • इस लेख से यह भी ज्ञात होता है कि धार्मिक भावना से अनुप्राणित होकर मानसरोवर झील का निर्माण करवाया गया था।
  • इसमे अम्रत मथन का उल्लेख मिलता हैं
  • इस शिलालेख के अत्यधिक भारी होने के कारण कर्नल जेम्स टॉड ने इसे इग्लैंड ले जाने की अपेक्षा समुन्द्र में फेकना उचित समझा !

7. सारणेश्वर प्रशस्ति (953 ई.)

  • उदयपुर के श्मशान के सारणेश्वर नामक शिवालय पर स्थित है
  • इस प्रशस्ति से वराह मंदिर की व्यवस्था, स्थानीय व्यापार, कर, शासकीय पदाधिकारियों आदि के विषय में पता चलता है।
  • गोपीनाथ शर्मा की मान्यता है कि मूलतः यह प्रशस्ति उदयपुर के आहड़ गाँव के किसी वराह मंदिर में लगी होगी।
  • बाद में इसे वहाँ से हटाकर वर्तमान सारणेश्वर मंदिर के निर्माण के समय में सभा मंडप के छबने के काम में ले ली हो।

8. कुंभलगढ़ शिलालेख-1460 ( राजसमंद )

  • यह शिलालेख कुम्भलगढ़ दुर्ग में सिथत कुंभश्याम के मंदिर ( इसे वर्तमान में मामदेव का मन्दिर कहते हैं) में मिला है,
  • इसकी निम्न विशेषतायें हैं-
    • इसमे गुहिल वंश का वर्णन हैं!
    • यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली रूप से जानने का महत्वपूर्ण साधन हैं!
    • यह राजस्थान का एकमात्र अभिलेख हैं जो महाराणा कुंभा के लेखन पर प्रकाश डालता हैं!
    • इस लेख में हम्मीर को विषम घाटी पंचानन कहा गया हैं!
  • यह मेवाड़ के महाराणाओं की वंशावली को विशुद्ध रूप से जानने के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है।
  • इसमें कुल 5 शिलालेखों का वर्णन मिलता है
  • इस शिलालेख में 2709 श्लोक हैं।
  • दासता, आश्रम व्यवस्था, यज्ञ, तपस्या, शिक्षा आदि अनेक विषयों का उल्लेख इस शिलालेख में मिलता है।
  • इस लेख का रचयिता डॉक्टर ओझा के अनुसार महेश होना चाहिए। क्योंकि इस लेख के कई साक्ष्य चित्तौड़ की प्रशस्ति से मिलते हैं।

9. प्रतापगढ़ अभिलेख (946 ई.)

  • इस अभिलेख मे गुर्जर -प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल की उपलब्धियों का वर्णन किया गया है।
  • तत्कालीन समाज कृषि, समाज एवं धर्म की जानकारी मिलती है।

10. विराट नगर अभिलेख (जयपुर)

  • अशोक के अभिलेख मौर्य सम्राट अशोक के 2 अभिलेख विराट की पहाड़ी पर मिले थे
    • भाब्रू अभिलेख
    • बैराठ शिलालेख
  • जयपुर में सिथत विराट नगर की बीजक पहाड़ी पर यह शिलालेख उत्कीर्ण हैं
  • यह शिलालेख पाली व बाह्मी लिपि में लिखा हुआ था
  • इस शिलालेख को कालांतर में 1840 ई. में बिर्टिश सेनादिकारी कैप्टन बर्ट दारा कटवा कर कलकत्ता के सग्रहालय में रखवा दिया गया
  • इस अभिलेख में सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म एवं संघ में आस्था प्रकट की गई है
  • इस अभिलेख से अशोक के बुद्ध धर्म का अनुयायी होना सिद्ध होता है
  • इसे मौर्य सम्राट अशोक ने स्वयं उत्कीर्ण करवाया था
  • चीनी यात्री हेनसांग ने भी इस स्थाल का वर्णन किया है!

11. फारसी शिलालेख

  • भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना के पश्चात् फारसी भाषा के लेख भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
  • ये लेख मस्जिदों, दरगाहों, कब्रों, सरायों, तालाबों के घाटों, पत्थर आदि पर उत्कीर्ण करके लगाए गए थे।
  • राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास के निर्माण में इन लेखों से महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है।
  • इनके माध्यम से हम राजपूत शासकों और दिल्ली के सुलतान तथा मुगल शासकों के मध्य लड़े गए युद्धों, राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों पर समय-समय पर होने वाले मुस्लिम आक्रमण, राजनीतिक संबंधों आदि का मूल्यांकन कर सकते हैं।
  • इस प्रकार के लेख सांभर, नागौर, मेड़ता, जालौर, सांचोर, जयपुर, अलवर, टोंक, कोटा आदि क्षेत्रों में अधिक पाए गए हैं।
  • फारसी भाषा में लिखा सबसे पुराना लेख अजमेर के ढ़ाई दिन के झोंपड़े के गुम्बज की दीवार के पीछे लगा हुआ मिला है।
  • यह लेख 1200 ई. का है और इसमें उन व्यक्तियों के नामों का उल्लेख है जिनके निर्देशन में संस्कृत पाठशाला तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया गया।
  • चित्तौड़ की गैबी पीर की दरगाह से 1325 ई. का फारसी लेख मिला है जिससे ज्ञात होता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद कर दिया था।
  • जालौर और नागौर से जो फारसी लेख में मिले हैं, उनसे इस क्षेत्र पर लम्बे समय तक मुस्लिम प्रभुत्व की जानकारी मिलती है।
  • पुष्कर के जहाँगीर महल के लेख (1615 ई.) से राणा अमरसिंह पर जहाँगीर की विजय की जानकारी मिलती है। इस घटना की पुष्टि 1637 ई. के शाहजहानी मस्जिद, अजमेर के लेख से भी होती है।

नोट-अजमेर शिलालेख राजस्थान में फ़ारसी भाषा का सबसे प्राचीन अभिलेख हैं!

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग/किले – Major Forts of Rajasthan

12. साडेश्वर अभिलेख

  • इस अभिलेख से वराह मंदिर की व्यवस्था स्थानीय व्यापार कर शासकीय पदाधिकारियों आदि के विषय में पता चलता है

13. कुमारपाल अभिलेख 1161ई.(1218 वि.स.)

  • इस अभिलेख से आबू के परमारों की वंशावली प्रस्तुत की गई है

14. चीरवे का शिलालेख ( 1273 ई. )

रचयिता- रत्नप्रभुसूरी + पार्श्वचन्द्र, उत्कीर्णकर्त्ता– देल्हण

  • चीरवे शिलालेख के समय मेवाड़ का शासक समर सिंह था।
  • चीरवा गांव उदयपुर से 8 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
  • एक मंदिर की बाहरी दीवार पर यह लेख लगा हुआ।
  • चीरवे शिलालेख में संस्कृत में 51 श्लोकों का वर्णन मिलता है।
  • चीरवे शिलालेख में गुहिल वंशीय, बप्पा, पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिहं और समर सिंह का वर्णन मिलता है।
  • चीरवे शिलालेख में चीरवा गांव की स्थिति, विष्णु मंदिर की स्थापना, शिव मंदिर के लिए खेतों का अनुदान आदि विषयों का समावेश है।
  • इस लेख में मेवाड़ी गोचर भूमि, सती प्रथा, शैव धर्म आदि पर प्रकाश पड़ता है।

15. रसिया की छत्री का शिलालेख ( 1274 ई. )

  • इस शिलालेख की एक शिला बची है। जो चित्तौड़ के पीछे के द्वार पर लगी हुई है।
  • इसमें बप्पा से नरवर्मा तक। गुहिल वंशीय मेवाड़ शासकों की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।
  • इस शिलालेख के कुछ अंश 13 सदी के जन जीवन पर प्रकाश डालते है।
  • नागदा और देलवाड़ा के गांवों का वर्णन मिलता है।
  • दक्षिणी पश्चिमी राजस्थान के पहाड़ी भाग की वनस्पति का चित्रण
  • इस शिलालेख से आदिवासियों के आभूषण वैदिक यज्ञ परंपरा और शिक्षा के स्तर की समुचित जानकारी का वर्णन मिलता है।

16. चित्तौड़ के पार्श्वनाथ के मंदिर का लेख (1278 ई. )

  • तेज सिंह की रानी जयतल्ल देवी के द्वारा एक पार्श्वनाथ के मंदिर बनाने का उल्लेख मिलता है।
  • जिसे भर्तृपुरीय आचार्य के उपदेश से बनवाया।
  • इस लेख से शासन व्यवस्था,धर्म व्यवस्था तथा धार्मिक सहिष्णुता के बारें में जानकारी मिलती हैं।

17. आबू का लेख ( 1342 ई. )

लेख श्लोक- 62, रचना- वेद शर्मा

  • बप्पा से लेकर समर सिंह तक के मेवाड़ शासकों का वर्णन,
  • इस लेख में आबू की वनस्पति तथा ध्यान,ज्ञान, यज्ञ आदि से संबंधित प्रचलित मान्यताओं का वर्णन मिलता है।
  • इस शिलालेख से लेखक का नाम शुभ चंद्र है।
  • शिल्पी सूत्रधार का नाम कर्मसिंह मिलता है

18. गंभीरी नदी के पुल का लेख

  • यह लेख किसी स्थान से लाकर अलाउद्दीन खिलजी के समय गंभीरी नदी के पुल के 10 वी सीढ़ियों पर लगा दिया गया।
  • इसमें समर सिंह तथा उनकी माता जयतल्ल देवी का वर्णन मिलता है।
  • यह लेख महाराणाओं की धर्म सहिष्णुता नीति तथा मेवाड़ के आर्थिक स्थिति पर अच्छा प्रकाश डालता है।

19. श्रृंगी ऋषि का शिलालेख ( 1428 ई. )

सूत्रधार– पन्ना

  • यह लेख खण्डित दशा में है। जिसका बड़ा टुकड़ा खो गया।
  • इस लेख की रचना कविराज वाणी विलास योगेश्वर ने की।
  • हमीर के संबंध में इसमें लिखा है कि उसने जिलवड़े को छीना और पालनपुर को जलाया।
  • हम्मीर का भीलों के साथ भी सफल युद्ध होने का उल्लेख मिलता।
  • इस लेख में लक्ष्मण सिंह और क्षेत्र सिंह की त्रिस्तरीय यात्रा का वर्णन मिलता है। जहां उन्होंने दान में विपुल धनराशि दी और गया में मंदिरों का निर्माण करवाया।

20. समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख ( 1485 ई. )

  • रचना- एकनाथ ने
  • उस समय में शिल्पियों के परिवारों का बोध।
  • इसमें लेख को शिल्पकार वीसल ने लिखा।
  • सूत्रधार-वसा
  • इसमें मोकल द्वारा निर्मित विष्णु मंदिर निर्माण का उल्लेख मिलता है।
  • इस लेख में यह भी लिखा मिलता है कि महाराजा लक्ष्मण सिंह ने झोटिंग भट्ट जैसे विद्वानों को आश्रय दिया था।
  • सिसोदिया एवं परमार वंश की जानकारी का साक्ष्य। चित्तौड़ दुर्ग में।

21. देलवाड़ा का शिलालेख ( 1334ई. सिरोही )

  • इस शिलालेख में कुल 18 पंक्तियां हैं।
  • जिसमें आरंभ की 8 पंक्तियां संस्कृत में और शेष 10 पंक्तियां मेवाड़ी भाषा में।
  • इस लेख में धार्मिक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पर प्रकाश पड़ता है।
  • टंक नाम की मुद्रा के प्रचलन का उल्लेख मिलता है।
  • मेवाड़ी भाषा का प्रयोग किया गया है जो उसमें की बोलचाल भाषा थी।

22. रायसिंह की प्रशस्ति ( 1593 में )

  • जूनागढ़ के दुर्ग के दरवाजे पर
  • रचयिता- जैन मुनि जइता/जैता(क्षेमरत्न कि शिष्य)
  • इस लेख में बीका से रायसिंह तक के बीकानेर के शासकों की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।
  • 60 वीं पंक्ति में रायसिंह के कार्यों का उल्लेख आरंभ होता है। जिनमें का काबुलियों, सिंधियों और कच्छियों पर विजय मुख्य हैं।
admin

Recent Posts

Atal Pension Yojana – अटल पेंशन योजना क्या है? योग्यता, आवश्यक दस्तावेज

Atal Pension Yojana Atal Pension Yojana या स्वावलम्बन योजना भारत सरकार द्वारा एक विशेष आयु समूह के लिए बनायीं गयी… Read More

51 years ago

Pongal 2021 कब है? पोंगल कैसे बनाते है? (मीठा पोंगल व्यंजन बनाने की विधि)

Pongal Pongal - दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल राज्य में मकर संक्रांति को 'पोंगल' के रुप में मनाया जाता… Read More

51 years ago

Gudi Padwa 2021 Date, Time – गुड़ी पाड़वा पर्व कैसे मनाते हैं?

Gudi Padwa Gudi Padwa - गुड़ी पाड़वा का पर्व चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस दिन… Read More

51 years ago

FilmyMeet 2020 Live Link: Free Download Punjabi, Hindi, Telugu Movies

FilmyMeet 2020 Live Link: Free Download Punjabi, Hindi, Telugu Movies FilmyMeet 2020 Live Link: Free Download Punjabi, Hindi, Telugu Movies… Read More

51 years ago

एकलव्य रहस्य: आखिर क्यों भगवान श्री कृष्ण ने “एकलव्य” का किया था वध?

एकलव्य एकलव्य को कुछ लोग शिकारी का पुत्र कहते हैं और कुछ लोग भील का पुत्र। प्रयाग जो इलहाबाद में… Read More

51 years ago

Karva Chauth 2020 Date, Time, Vrat Katha – करवा चौथ 2020

Karva Chauth Karva Chauth - करवा चौथ का दिन और संकष्टी चतुर्थी, जो कि भगवान गणेश के लिए उपवास करने… Read More

51 years ago

For any queries mail us at admin@meragk.in