क्यों श्री कृष्ण ने अभिमन्यु की रक्षा नहीं की?

महाभारत यूं तो भारत के महानतम ग्रंथों में से एक है, साथ ही साथ हमें अधर्म पर धर्म की विजय का सन्देश भी देता है| महाभारत को बार बार पढ़ने पर कुछ न कुछ संपूर्ण महाभारत में ऐसा मिल ही जाता है, जिसे जानने की जिज्ञासा बार बात उत्पन्न होती है। जिनमे से प्रमुख हैं, क्यों कर्ण को सूर्य पुत्र होने के बाद भी दुर्योधन जैसे दुराचारी का साथ मिला?, क्यों धर्म का साथ देने पर भी स्वयं श्री कृष्णा को वंश की समाप्ति का श्राप मिला?, क्यों भीष्म पितामह को शैय्या पर अपने अंतिम दिन बिताने पड़े?, इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए अनेक कथाओं का वर्णन है। ये सभी अपने जीवन का अधिकतम समय बिता चुके थे, परन्तु उस महाभारत में एक पराक्रमी शूरवीर ऐसा भी था जिसने बहुत ही काम आयु में मृत्यु को अपने गले लगा लिया था, वो थे “अभिमन्यु”।

श्री कृष्णा ने अभिमन्यु को शिक्षा प्रदान की थी, वे उसके गुरु थे और अर्जुन अभिमन्यु के पिता। अभिमन्यु बचपन से हो शूरवीर थे, पांडवों के वनवास के समय अभिमन्यु माता सुभद्रा के साथ श्री कृष्णा के पास थे, और वहीँ उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुयी थी| अज्ञातवास में अर्जुन विराट नगर में थे, जहाँ वो राजकुमारी उत्तरा को नृत्य कला का अभ्यास कराते थे। वहीँ उन्होंने अज्ञातवास पूर्ण होने पर अभिमन्यु के लिए राजकुमारी उत्तरा का हाथ माँगा था। अभिमन्यु और उत्तरा का एक पुत्र हुआ जिनका नाम था “परीक्षित”। कहते हैं परीक्षित भी अभिमन्यु की तरह महान थे। परीक्षित के जीवन काल में कलियुग कभी उनपर हावी नही हो पाया और परीक्षित की मृत्यु से साथ की द्वापरयुग का भी अंत हो गया। परीक्षित पिता अभिमन्यु महाभारत के युद्ध के समय अल्पायु के ही थे, और जब अर्जुन को युद्ध से दूर ले जाया जा रहा था श्री कृष्णा ये जानते थे कि चक्रव्यूह की रचना को तोड़ते हुए आज अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो जायेगा। ये सब जानते हुए श्री कृष्णा ने अभिमन्यु को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया। आज हम इसी बात के पीछे का कारण जानेंगे की आखिर क्यों श्री कृष्णा ने अभिमन्यु को क्यों नहीं बचाया?

भगवान् श्री कृष्णा को नारायण अवतार माना गया है। द्वापरयुग में अधर्म बढ़ने के कारण श्री नारायण ने कंस के वध हेतु श्री कृष्णा रूप में अवतार लिया था। श्री नारायण के बहुत से अवतार रहे हैं जिनमे मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंघ, श्री राम, परशुराम विख्यात हैं। माना जाता है जब जब श्री नारायण ने धरती पर अवतार लिया है तब-तब परमपिता श्री ब्रह्मा के आदेश से अन्य देवी देवताओं के पुत्र-पुत्री भी धरा पर अवतार लेकर अपना सहयोग प्रदान करते रहे हैं। इसी प्रकार महाभारत युग में श्री कृष्णा की सहायता हेतु श्री ब्रह्मा के आदेश से सभी देवी देवता अपना सहयोग प्रदान करने के लिए तैयार थे, परन्तु चंद्र देवता इस बात से असहमत थे।

चंद्र देव अपने पुत्र से बहुत प्रेम करते थे, ब्रह्मा जी के आदेश से चंद्र देव के पुत्र को धरती पर अवतरित होना था, और इस बात से चंद्र देव बिलकुल भी नही सहमत थे| वे नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र इस धरती में जन्म लेकर किसी भी प्रकार के दुःख की प्राप्ति करे। सभी देवी देवताओं के अथक प्रयास के बाद भी चंद्र देव ने किसी भी प्रकार की सहमति प्रदान नहीं की। देवताओं द्वारा उन्हें यह स्मरण कराया गया की यह अधर्म के ऊपर धर्म की स्थापना के लिए युद्ध है, श्री नारायण का यह अवतार उसमें मुख्य भूमिका निभाने वाला है, इस महान कार्य में योगदान के लिए आप अपने पुत्र को उनकी सहायता के लिए धरती पर अवतरित होने दें। यह सुनकर चंद्र देव ने हिचकिचाते हुए अपने पुत्र “बरचा” को धरती पर अवतरित होने की आज्ञा प्रदान कर दी, परन्तु चंद्र देव की चार प्रमुख शर्तें थी:

1. मेरा पुत्र धरती पर अत्यधिक समय नहीं व्यतीत करेगा, क्यूंकि वह देव पुत्र है तो वह स्वर्ग लोक जल्दी वापिस आएगा और धरती पर अभिमन्यु के नाम से जाना जायेगा।

2. अभिमन्यु के पिता के रूप में अर्जुन को ही स्थान प्राप्त होगा, क्यूंकि वो जानते थे की अर्जुन एवं श्री कृष्णा “नर एवं नारायण” का ही अवतार हैं। नर एवं नारायण दो शरीर परन्तु एक आत्मा थे| अर्जुन के पुत्र होने का मतलब था स्वयं नारायण का पुत्र कहलाना।

3. चंद्र देव जानते थे की सभी पांडव देव पुत्र हैंऔर सभी पराक्रमी हैं| यदि युद्ध किया गया तो सभी अपने पराक्रम से जाने जायेंगे और उन सभी के पराक्रम के बीच अभिमन्यु अपना पूर्ण प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। इसलिए उन्होंने यह शर्त रखी कि युद्ध में अभिमन्यु सिर्फ उस एक दिन अपनी शूरवीरता का परिचय देंगे जिस दिन अभिमन्यु के अलावा और कोई युद्ध नहीं करेगा,और इस प्रकार वो बालक अपने पराक्रम की वजह से संपूर्ण जगत में विख्यात होगा। इसलिए अभिमन्यु को युद्ध में सिर्फ उसी दिन युद्ध में प्रदर्शन करने का अवसर प्राप्त हुआ जिस दिन अर्जुन को युद्ध भूमि से दूर ले जाया गया और उसी दिन चक्रव्यूह की रचना की गयी। क्यूंकि कोई भी चक्रव्यूह को भेदना नहीं जानता था, इसलिए सिर्फ अभिमन्यु ही उस दिन अपनी वीरता का प्रदर्शन कर पाए।

4. चंद्र देव् की आखिरी शर्त थी,अभिमन्यु की मृत्यु के पश्चात,अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को ही राज्य भार दिया जायेगा। अभिमन्यु, अर्जुन के पुत्र थे, जबकि परम्पराओं के अनुसार राज्य युधिष्ठिर के पुत्र को दिया जाना चाहिए था, परन्तु क्यूंकि चंद्र देव की ये ही शर्त थी इसलिए स्वर्गारोहण से पहले युधिष्ठिर ने राज्य का दायित्व अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को दिया। परीक्षित ने अपने राजा होने का दायित्व पूर्ण रूप से निभाया था।

इन्हीं सब कारणों की वजह से श्री कृष्णा चाहते हुए भी अभिमन्यु की सहायता नहीं कर पाए। अभिमन्यु के बहुत बार आग्रह करने पर भी श्री कृष्णा ने उन्हें चक्रव्यूह से बाहर निकलना नहीं सिखाया, क्यूंकि वे जानते थे कि वे चंद्र देव के साथ वचनबद्ध हैं| चंद्र देव की इन शर्तों की वजह से अभिमन्यु युद्ध में अकेले प्रदर्शन कर पाए, और अपने पराक्रम और शूरवीरता का परिचय देते हुए अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए। अपने अंत समय में अभिमन्यु अकेले निहत्थे ही सात महारथियों से युद्ध कर रहे थे जिनमे कर्ण, दुर्योधन, दुःशासन, द्रोणाचार्य, कुल गुरु कृपाचार्य, शल्य और मामा शकुनि थे।

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