द्रौपदी विवाह की कहानी

द्रुपद अपनी बेटी द्रौपदी का विवाह अर्जुन से करवाना चाहते थे परंतु जब उन्हें पता चला की वारणावत में पांचों पांडवों की मृत्यु हो गई है तो उन्होंने द्रोपदी को दूसरे पति का चुनाव करने के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। स्वयंवर की शर्त के अनुसार एक बर्तन में एक मछली को छोड़ दिया गया था और शर्तानुसार मछली के प्रतिबिम्ब में उस मछली को देख कर उसकी आँख पर निशाना लगाना था। प्रतियोगिता में बहुत बड़े-बड़े राजा महाराज आए थे परंतु सभी इस कार्य में असफल रहे।

जब कर्ण ने कोशिश करना चाहा तो द्रोपदी ने कोशिश करने से पहले ही से कर्ण से विवाह करने से इंकार कर दिया और कहा मैं एक सारथी के पुत्र से विवाह नहीं करूंगी।तभी पांचो पांडव ब्राह्मण के रूप में वहां पहुंचे और अर्जुन ने प्रतिबिंब में देखते हुए मछली को तीर से मारा और प्रतियोगिता को जीत लिया। उसके बाद द्रौपदी का विवाह अर्जुन से हो गया।  जब वह पांचो पांडव घर अपनी माता कुंती के पास पहुंचे तो उन्होंने कहां की अर्जुन  को एक प्रतियोगिता में एक फल की प्राप्ति हुई है। यह सुनकर कुंती ने उत्तर दिया जो भी फल है सभी भाई समान भागों में बांट लो। ऐसा होने के कारण ही द्रौपदी पाँचों पांडवों की पुत्री हुयी और पांचाली कहलायी।

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