द्रौपदी चीर हरण की कहानी

कौरव की ओर से शकुनी मामा के चाल के कारण पांडवों ने अपना सबकुछ पासों के खेल में खो दिया। अपने राज्य को किसी भी तरह वापस पाने के लिए युधिष्ठिर ने अंत में अपने सभी भाइयों समेत द्रौपदी तक को दाव पर लगा दिया और वह द्रौपदी को भी पासों के खेल में हार गए। जब द्रौपदी को भी पांडव हस्तिनापुर में पासों के खेल में हार गये तब दुर्योधन ने छोटे भाई दुशासन को रानी द्रौपदी को दरबार में लाने के लिए कहा। तभी दुशासन द्रौपदी के पास गया और उनके बालों को पकड़कर खींचते हुए दरबार में लेकर आया। सभी कौरवों ने मिलकर द्रौपदी का बहुत अपमान किया।

दुर्योधन ने उसके बाद अपने भाई को भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण अर्थात निर्वस्त्र करने को कहा।  दुशासन ने बिना किसी लज्जा के द्रौपदी के वस्त्र को खींचना शुरू किया परन्तु भगवान् श्री कृष्ण की कृपा से दुशासन कपडे खींचते-खींचते थक गया परन्तु वह रानी द्रौपदी का चिर हरण ना कर पाया। ऐसा माना जाता है एक बार श्री कृष्ण के हाथ से रक्त धरा बहने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक छोटा श्री कृष्ण के हाथों में बाँधकर रक्त के प्रवाह को रोका था, उसी दिन श्री कृष्ण ने द्रौपदी को उसकी रक्षा का वचन दिया था और उसी वचन को उन्होंने हस्तिनापुर की सभा द्रौपदी के स्त्रीत्व की रक्षा कर पूरा किया।

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