शिखंडी: एक रहस्यमयी व्यक्ति, जानिये कौन था शिखंडी?

महाभारत का युद्ध द्वापरयुग में अधर्म पर धर्म की जीत का युद्ध था। महाभारत में ऐसे अनेकों पात्र हैं जिनकी अपनी कुछ विशेष भूमिकाएं हैं। किसी ने लम्बे समय तक युद्ध भूमि में रहकर कौरव पक्ष के साथ घनघोर युद्ध किया तो किसी ने रणनीति में अपना योगदान दिया। महाभारत में पात्रों के अलावा श्राप, प्रतिज्ञाओं और वरदानों की भी प्रमुख भूमिका है। भीष्म पितामह हस्तिनापुर की रक्षा के लिए प्रतिज्ञाबद्ध थे तो महाभारत समाप्त होने पर भगवान् श्री कृष्णा को गांधारी द्वारा श्राप दिया गया। वहीँ जयेषः पाण्डु पुत्र कर्ण का जन्म भगवन सूर्य द्वारा दिए गए एक मंत्र का फल था तो द्रुपद पुत्र की उत्पत्ति एक वरदान के कारण हुयी थी।

इन्हीं सबके बीच एक विशेष पात्र का वर्णन महाभारत में मिलता है जिसने महाभारत में बहुत लम्बी भूमिका तो नहीं परन्तु अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक ऐसा पात्र जिसके महाभारत की रणभूमि में आने भर से ही पांडवों की विजय सुनिश्चित हो गयी थी, महाभारत के युद्ध के १०वें दिन ही इस योद्धा ने पांडवों की जीत को सुनिश्चित कर दिया था। एक ऐसा योद्धा जिसने युद्ध में शस्त्र का प्रयोग तो नहीं किया परन्तु एक ऐसे कवच को धारण किया हुआ था जिसे भेद पाना पितामह भीष्म के लिए भी असंभव था। हम बात कर रहे हैं “शिखंडी” की।

महाभारत कथा के अनुसार काशीराज की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा का यह तीसरा अवतार था। अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए उसने भगवान् शिव की बड़ी घोर तपस्या की और अपनी तपस्या से भगवान् शिव को प्रस्सन किया। भगवान् शिव द्वारा जब अम्बा को एक वरदान मांगने को कहा गया तो उन्होंने राजा द्रुपद के यहाँ जन्म लेने का वरदान माँगा। महाभारत के युद्ध में अपने पिता द्रुपद के साथ शिखंडी ने पांडवों के लिए कौरवों से युद्ध किया। अम्बा काशीराज की ज्येष्ठ पुत्री थी और उसकी दो बहनें भी थी, जिनका नाम था अम्बिका एवं अम्बालिका। जब काशीराज की तीनों पुत्रियां विवाह योग्य हो गयी तो काशीराज ने अपनी तीनों पुत्रियों का स्वयंवर रचाया।

इसी दौरान पितामह भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए काशीराज की तीनों पुत्रियों को स्वयंवर भवन से ही अपने साथ हस्तिनापुर ले गए। हस्तिनापुर पहुंचकर अम्बिका और अम्बालिका ने तो विचित्रवीर्य को स्वीकार कर लिया परन्तु अम्बा ने किसी और के प्रति आसक्त होने की बात उनके सम्मुख रखी और बताया की वो उन्हें मन ही मन अपना पति मान चुकी हैं। जिसके बाद पितामह भीष्म ने अम्बा को सकुशल वापिस भेजने का आदेश दिया, परन्तु वापिस जाने के बाद भी अम्बा को तिरस्कृत होना पड़ा और वो हस्तिनापुर वापिस लौट आयी। यहां आकर अम्बा ने अपने तिरस्कार का दायित्व भीष्म पर डाला एवं उनसे विवाह करने का आग्रह किया। पितामह भीष्म अम्बा से विवाह नहीं कर सकते थे क्यूंकि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की थी, यह सब जानने के बाद भी अम्बा अपनी बात पर अडिग रही और अंततः ये प्रतिज्ञा की, की वो स्वयं ही भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी।

अम्बा की इस बात का भान परशुराम को भी हुआ था, जिसके बाद उन्होंने पितामह भीष्म को अम्बा से विवाह करने की आज्ञा दी थी। पितामह भीष्म ने यहाँ भी अपने गुरु परशुराम को अपनी प्रतिज्ञा से अवगत कराया। जब परशुराम नहीं माने तो पितामह भीष्म को अपने गुरु परशुराम युद्ध करना पड़ा, जिस युद्ध में पितामह भीष्म विजयी हुए। अम्बा ने मृत्यु के पश्चात पुनः एक राजा के पुत्र के रूप में जन्म लिया, परन्तु क्यूंकि उसके पास अपने पूर्व जीवन की स्मृति थी इसलिए उसने भगवान् शिव की तपस्या आरम्भ कर दी। अम्बा की तपस्या से प्रस्सन होकर भगवन शिव ने उससे एक वर मांगने को कहा। वर के रूप में अम्बा ने राजा द्रुपद के यहाँ जन्म लेने की बात कही।

शिखंडी का जन्म राजा द्रुपद के यहाँ एक पुत्री के रूप में हुआ था, परन्तु उसके जन्म के समय के यह आकाशवाणी हुई कि शिखंडी का लालन पालन एक पुत्र के समान किया जाये। आकाशवाणी के अनुसार ही राजा द्रुपद ने शिखंडी का लालन पालन किया, उसे युद्ध परीक्षण दिया गया और एक पुत्र के सारे दायित्वों से उसे अवगत कराया गया। कालांतर में शिखंडी का विवाह भी एक कन्या से कर दिया गया था, परन्तु विवाह के पश्चात शिखंडी का सच सामने आने पर उसने शिखंडी का तिरस्कार किया, जिसके पश्चात शिखंडी ने मृत्यु का आलिंगन करना चाहा। उसी समय शिखंडी को “यक्ष” द्वारा पौरुषत्व प्रदान किया गया, जिसके बाद शिखंडी ने अपना वैवाहिक जीवन ख़ुशी ख़ुशी व्यतीत किया। महाभारत के युद्ध में शिखंडी अर्जुन के रथ पर सवार होकर पितामह भीष्म के सामने आया था, पितामह भीष्म ने शिखंडी के रूप में अम्बा को पहचान लिया था और अपना धनुष बाण त्याग दिया था। उसके बाद अर्जुन द्वारा पितामह भीष्म पर बाणों की बौछार की गयी और भीष्म को बाण शैय्या प्रदान हुयी।

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद, अश्वत्थामा द्वारा जब द्रौपदी के पाँचों पुत्रो का वध किया गया उसी समय शिखंडी का वध भी कर दिया था। ऐसा माना जाता है शिखंडी की मृत्यु के पश्चात यक्ष द्वारा प्रदान किया गया पौरुषत्व यक्ष के पास वापिस आ गया।

और इस प्रकार अम्बा ने अपने प्रतिशोध के लिए दो बार इस धरती पर जन्म लिया और अपनी प्रतिज्ञा को शिखंडी के रूप में पूरा किया। शिखंडी महाभारत के युद्ध में १०वें दिन रणभूमि में आये थे, और अपने आने के साथ ही उन्होंने पांडवों की जीत को सुनिश्चित कर लिया। हालांकि एक स्त्री को युद्ध में लाने का विचार भी स्वयं पितामह भीष्म ने तब दिया था जब पांडव उनके पास युद्ध में उन्हें ही रोकने का उपाय पूछने गए थे। श्री कृष्णा जानते थे की पितामह भीष्म अपने प्रिय पाण्डु पुत्रो को ये बात अवश्य ही बता देंगे, इसलिए श्री कृष्णा द्वारा ही ये उपाय दिया था की स्वयं ही पितामह से उन्हें रोकने का उपाय पूछा जाये। इस प्रकार द्वारयुग के एक महान योद्धा को बाण शैय्या मिली एवं सूर्य उत्तरायण होने पर उन्होंने अपनी म्रुत्यु का आलिंगन किया और शिखंडी की मृत्यु भी अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के बाद हुयी और इस प्रकार अम्बा भी आने बार बार धरती पर जन्म लेने की प्रकिया से मुक्त हो गयी।

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