मध्वाचार्य जयंती 2021, मध्वाचार्य का जीवन परिचय | Madhvacharya Jayanti 2021 in Hindi, Madhvacharya Biography in Hindi

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मध्वाचार्य भक्ति आन्दोलन के समय के सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिकों में से एक थे। इन्हें वायु का तृतीय अवतार माना जाता है। इन्होंने कर्म को मानव जीवन का मूलभूत अंग तथा सिद्धान्त बताया है। इनके अनुसार मानव कर्म की श्रेष्ठता के कारण पुनर्जन्म के कष्टों से सदा के लिए मुक्ति पा सकता है। वे द्वैतवाद के समर्थक और अद्वैतवाद के विरोधी थे वही यह तत्ववाद के प्रवर्तक मे से एक थे। तत्ववाद को द्वैतवाद के नाम से जाना जाता था। 

मध्वाचार्य ने अपने सिद्धांतों के साथ हिंदू आध्यात्मिकता की महिमा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और हिंदू धर्म पर प्रभाव डाला। श्री मध्वाचार्य सर्वश्रेष्ठ हिंदू संतों और दार्शनिकों में से एक थे जो द्वैत दर्शन के संस्थापक और प्रतिपादक थे। हमारे द्वारा आपके लिए श्री मध्वाचार्य के बारे में कुछ उपयोगी जानकारी एकत्र की गयी है, आशा है कि आपको पसंद आएगा।

मध्वाचार्य जयंती 2021 (Madhvacharya Jayanti 2021 in Hindi)

अश्विन शुक्ल पक्ष की मध्वाचार्य दशमी तिथि को व्यापक रूप से श्री मध्व जयंती या मध्वाचार्य जयंती के रूप में जाना जाता है। श्री मध्वाचार्य का जन्म विजय दशमी के शुभ दिन पर हुआ था, जिसे दशहरा भी कहा जाता है। इस वर्ष मध्वाचार्य जयंती 15 अक्टूबर 2021 को है।

मध्वाचार्य जीवन परिचय एक नजर में (Madhvacharya Biography in Hindi)

नाममध्वाचार्य 
बचपन का नामवासुदेव
अन्य नामपूर्ण प्रज्ञा, आनन्दतीर्थ  
पितामध्यगेह भट्ट
मातावेदवती
सिद्धांतद्वैतवाद
जन्म तिथि1238 ईस्वी
जन्म स्थानपजाका क्षेत्र, कर्नाटक
गुरुअच्युत प्रकाशाचार्य
मृत्यु1317 ईस्वी

मध्वाचार्य जन्म के बारे में (Madhvacharya Birthday)

श्री मध्वाचार्य  को उनके बचपन के दौरान वासुदेव नाम से जाना जाता था, पिता ने उन्हें वासुदेव नाम दिया। उनका जन्म कर्नाटक राज्य में मैंगलोर के पास उडुपी के मंदिर शहर से लगभग 10 किमी दूर एक छोटे से गाँव में 1238 ईस्वी मे हुआ था, जिसे वर्तमान में पजाका क्षेत्र कहा जाता है। उनका जन्म तुलु ब्राह्मणों के परिवार में हुआ था और वह मध्यगेह भट्ट के पुत्र थे और इनकी माता वेदवती थी। वेदवती एक संयमी महिला थीं। माधव को वायु देवता की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। 

मध्वाचार्य ने शारीरिक गतिविधियों और मैदानी खेलों में खुद को साबित किया था। वह दौड़-कूद कर सकते थे और तैर सकते थे, तो लोगों ने उन्हें उपनाम भीम दिया। माधव ने वेदों और वेदांगों का अध्ययन किया और उनमें ज्ञानी निकला, इसलिए मध्व को पूर्ण प्रज्ञा के नाम से जाना जाता था। वहीं वेदांत में पारंगत हो जाने पर इन्हें आनन्दतीर्थ नाम दिया गया और मठाधीश बनाया गया। 

कुछ समय पश्चात आनंदतीर्थ को मध्व नाम प्रदान किया गया। इन्होंने पहले अद्वैतवाद की शिक्षा ली थी, परंतु यह उससे संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने द्वैतवाद की ओर रुख किया। ऐसा माना जाता है कि भगवान नारायण की आज्ञा से ही वायुदेव ने भक्तिसिद्धान्त की रक्षा और प्रचार के लिये श्री मध्वाचार्य के रूप में अवतार लिया था।

बहुत छोटी आयु में ही उन्हें संपूर्ण विधाओं का ज्ञान प्राप्त हो गया था। इसके बात इन्होने सन्यास ग्रहण करने की इच्छा अपने माता-पिता के सम्मुख प्रकट की।

मध्वाचार्य सन्यास

मध्वाचार्य ने अपने 11वें वर्ष में संन्यास ग्रहण किया। इन्होंने अच्युत प्रकाशाचार्य को अपना गुरु बनाया और उनसे दीक्षा ग्रहण की। अच्युत प्रकाशाचार्य ने पाया कि वेदांत और विभिन्न पवित्र लेखों के बारे में सभी जानकारी के साथ मध्व एक शानदार संन्यासी थे। उन्होंने मठ के शीर्ष के रूप में मध्व को रखा, जिसके बाद मध्व को अब आनंद तीर्थ का नाम मिला। इनकी विद्वता को देखते हुए पूरे दक्षिण भारत में इन्हें पहचान मिली।

मध्वाचार्य वायु देवता के अवतार

मध्वाचार्य को वायु देवता का तीसरा अवतार माना गया है, वायु देवता का पहला अवतार हनुमान और दूसरा अवतार भीम है। ब्रह्म सूत्र मे लिखे भाष्य के द्वारा भी यह बात स्पष्ट होती है। मध्वाचार्य के अनुसार वह विष्णु और अद्वैतवाद के अनुयायी हैं, जो माध्यम की तरह भक्ति का प्रचार करते हैं।

मध्वाचार्य की द्वैतवाद मे भूमिका

अद्वैतवाद में दीक्षित होने पर भी मध्व को प्रमुख रूप से दो आपत्तियाँ थी। पहली आपत्ति यह थी कि अद्वैत वेदांत के द्वारा सामान्य अनुभव की उपेक्षा की गई थी। जीव और ब्रह्म के अलग होने पर भी शंकर ने उनमें अद्वैत माना है। दूसरी आपत्ति यह थी कि शंकराचार्य के निर्गुण ब्रह्म की संकल्पना मानव को शान्ति प्रदान करने में असमर्थ है।

मध्वाचार्य की शिक्षाओं के अनुसार भगवान विष्णु (हरि) सर्वोच्च है और अपनी पत्नी श्री लक्ष्मी के साथ वैकुंठ में निवास करते है। हम जो दुनिया देखते है वह वास्तविक है और अंतर सत्य है। विष्णु ही एकमात्र स्वतंत्र वास्तविकता है। सभी जीवित और निर्जीव प्राणी विष्णु पर निर्भर है। आत्मा और संसार विष्णु पर निर्भर है और विष्णु से अलग है। भक्ति ही मानव की मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र साधन है।

मध्वाचार्य का भक्तिपरक मत

आचार्य मध्व का मत भक्ति परक मत है जोकि अमला भक्ति के नाम से प्रसिद्ध है। कहीं-कहीं इसे ब्रह्म सम्प्रदाय के नाम से भी जाना जाता है। दूसरे सम्प्रदायों में विष्णु को केवल परम तत्व का प्रतीक माना गया है, जबकि मध्व के अनुसार विष्णु स्वयं परम तत्व है।

मध्वाचार्य के ग्रन्थ

मध्वाचार्य ने अनेक ग्रन्थों की रचना की थी। उन्होंने पाखण्डवाद का खण्डन किया और जन-जन में भगवान की भक्ति का प्रचार करके लोगों को कल्याण पथ की ओर लेकर गए। अपने मत को व्यक्त करने के लिए मध्व ने 30 वर्षों तक ग्रंथ लेखन किया। इन्होंने 37 ग्रंथों की रचना की जिनमे से निम्न के नाम इस प्रकार है:-

  • ऐतरेय
  • छान्दोग्य
  • केन
  • कठ
  • बृहदारण्यक
  • उपनिषदों का भाष्य
  • गीताभाष्य
  • भागवत तात्पर्य निरणय
  • महाभारत तात्पर्य निर्णय
  • विष्णु तत्व निर्णय
  • प्रपंच मिथ्या तत्व निर्णय
  • गीता तात्पर्य निर्णय
  • तंत्र सार संग्रह
  • माधवा भाष्य
  • ऋग्वेद के 40 श्लोक का अनुवाद
  • अनु-व्याख्यान (ब्रह्म सूत्र का अनुवाद)

मध्वाचार्य के प्रमुख सिद्धांत

मध्वाचार्य के अनुसार ब्रह्म विष्णु या नारायण है। ब्रह्म ही परम तत्व है, जिसे परब्रह्म, विष्णु, नारायण, हरि, परमेश्वर, ईश्वर, वासुदेव, परमात्मा आदि नामों से जाना जाता है। वह चैतन्य स्वरूप में स्थापित है परंतु निर्गुण नहीं है। वह जगत का पालनहार करने वाला है। ब्रहम अपनी इच्छा अनुसार ही जगत की रचना करता है। जीव और जगत् ब्रह्म के अधीन ही है, अत: वह स्वतंत्र है, परंतु जीव और जगत् अस्वतंत्र है।

इनके सिद्धांत के अनुसार विष्णु ही उत्पन्न करने वाला, संहार नियमन, ज्ञान आवरण, बन्ध तथा मोक्ष के कर्ता है। विष्णु की शक्ति लक्ष्मी है और वह भी भगवान की भान्ति ही स्वतंत्र है। लक्ष्मी जी को दिव्य विग्रहधारिणी होने के कारण अक्षरा कहा गया है।

श्री मध्वाचार्य ने शंकराचार्य के माया बात का खंडन किया है और कहा जिस प्रकार प्रकाश और अंधकार कभी भी एक साथ नहीं रहते है उसी प्रकार सच्चिदानंद भ्रम कभी भी अविद्या से प्रभावित नहीं होता है।  यदि अविद्या सत्य है तो अद्वैत सिद्धांत ग़लत है और अविद्या असत्य है तो उसका  प्रभाव कैसे पड़ सकता है।

माधवाचार्य के अनुसार जीव ब्रह्म से अलग है, परंतु जीव के भीतर भी सत्, चित् तथा आनन्द का निवास है और  यह सब जीव को ब्रह्म से ही प्राप्त है। ब्रह्म सदा स्वतंत्र है और जीव ब्रह्म के अधीन है। संसार में प्रत्येक जीव अपना अलग अस्तित्व  बनाए रखता है। जीवो को भी ऊंच-नीच के आधार पर अलग-अलग श्रेणी में रखा गया है। सबसे ऊंची श्रेणी में देवता आते है उसके बाद मनुष्य को रखा गया है और अंतिम श्रेणी में अदम जीव जैसे दैत्य, राक्षस, पिशाच, आदि आते है।

उनके अनुसार जगत की रचना ईश्वर की इच्छा से ही होती है। जीव प्रत्येक देह में अलग है और वह कभी भी भगवान के साथ नहीं जुड़ सकता। जीव सदा अज्ञान वह असत्य आदि में ही उलझा रहता है।

मध्व के अनुसार वैकुण्ठ की प्राप्ति  ही मुक्ति है और  मुक्त जीव भी ईश्वर का सेवक ही  है। जीव को मुक्ति के लिए प्रपंच भेद का ज्ञान होना आवश्यक है। प्रपंच भेद निम्न प्रकार है:-

1- ब्रह्म जीव से अलग है

2- ब्रह्म जगत् से भी अलग है

3- एक जीव अन्य जीव से अलग है

4- जीव जगत् से अलग हैं

5- जगत का एक अंश अन्य अंश से अलग है

6- भक्ति ही जीव की मुक्ति का साधन है।

मध्वाचार्य के सेवा के प्रकार

जीव के द्वारा सेवा तीन प्रकार से की जा सकती है

1- भगवान के नाम की छाप शरीर पर लगाना

2- भगवान के नाम पर पुत्र आदि का नाम रखना

3- भजन करना

मध्वाचार्य के भजन के प्रकार

मध्वाचार्य के अनुसार भजन के 10 प्रकार हैं।

वाचिक-

1. सदैव सत्य बोलना
2. सभी के हित के वाक्य बोलना
3. प्रिय वाचन
4. स्वाध्याय

शारीरिक-

5. सदा जरूरतमंद को दान देना
6. किसी दरिद्र व्यक्ति का उद्धार करना
7. शरण मे आने वाले की सदैव रक्षा करना

मानसिक-

8. गरीब के दु:ख दूर करना
9. भगवान का दास बनने की इच्छा रखना
10. गुरु और शास्त्र पर सदैव विश्वास करना

मध्वाचार्य के प्रमाण मीमांसा के सम्बन्ध में भी विचार ध्यान देने योग्य है। इन्होंने प्रमाण शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया है:-

1- यथार्थ ज्ञान:- जब जीव किसी वस्तु का ठीक-ठाक ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो वह प्रमाण कहलाता है

2- यथार्थ ज्ञान का साधन:- जिस साधन के द्वारा जीव को ज्ञान की प्राप्ति होती है उसे अनुप्रमाण कहते है

माधवाचार्य का भारत भ्रमण

वह भक्ति के अपने शुभ समाचार का व्याख्यान देने के लिए  भारत में एक व्यापक यात्रा पर गए। उन्होंने कुछ धर्मांतरण किए। वे बद्रीनारायण गए वहाँ पर इन्हें भगवान वेदव्यास के दर्शन हुए। व्यासजी ने इनसे प्रसन्न होकर इन्हें तीन शालिग्राम-शिलाएँ प्रदान की, इन्होंने उनकी स्थापना सुब्रह्मण्य, मध्यतल और उडुपी में की और लौटने के कुछ समय बाद उन्होंने भगवद गीता और वेदांत सूत्रों पर अपना विश्लेषण लिखा।

माधव के पास अलौकिक शक्तियां थीं। उन्होंने कई अलौकिक घटनाएं कीं। इन्होंने एक जहाज को बचाया जो तूफान में फंस गया था। वही जब एक व्यापारी का जहाज द्वारका से मालाबार की ओर जा रहा था तो तुलुब  में डूब गया। उसमें भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति थी जिसे माधवाचार्य ने जल से निकाला और उसकी स्थापना उडुपी में की।

मध्वाचार्य द्वारा स्थापित माधव मठ 

मध्वाचार्य जी ने उडुपी में 8 मठों की स्थापना की, जिन्हें माधव मठों के नाम से जाना जाता है:-

  1. पलिमारू मठ
  2. अदामारू मठ
  3. कृष्णपुरा मठ
  4. पुत्तिजे मठ
  5. शिरूर मठ
  6. सोधे मठ
  7. कनियूरू मठ
  8. पेजावर मठ

इन मठों में साधु-सन्यासी रहते हैं और मध्वाचार्य के द्वारा स्थापित “परयाया सिस्टम” के आधार पर साधु यहां से शिक्षा व दीक्षा लेते है|

भारत में कुल 24 माधव मठ स्थापित है। कर्नाटक राज्य माधव संस्कृति का मुख्य केंद्र है। माधव मठ के मुख्य संत को स्वामी कहते हैं। मध्वाचार्य द्वारा निर्धारित विधि के द्वारा एक निश्चित समय के बाद उत्तराधिकारी स्वामी का चुनाव किया जाता है। प्रत्येक दिन मठ में 15,000 से 20,000 लोगों के लिए खाना बनाया जाता है और उत्तराधिकारी चुने जाने पर करीब 80,000 लोगों का भोजन तैयार किया जाता है।

माधवाचार्य की मृत्यु

1238 ईस्वी में जन्मे श्री माधवाचार्य 79 वर्ष तक जीवित रहे। यह जीवन के अन्तिम समय में सरिदन्तर नामक स्थान पर थे और नवमी तिथि के 9वें दिन इन्होंने पंच भौतिक शरीर का त्याग किया और इस दुनिया को 1317 ईस्वी को छोड़ दिया।

देहत्याग से पहले इन्होंने अपने शिष्य पद्मनाभतीर्थ को श्रीरामजी की मूर्ति और व्यास जी के द्वारा प्रदान की हुई शालिग्राम शिला देकर अपने मत के प्रचार की आज्ञा दी।

FAQs

  1. श्री मध्वाचार्य का जन्म कब हुआ?

    विजय दशमी

  2. मध्वाचार्य के बचपन का क्या नाम था?

    वासुदेव

  3. मध्वाचार्य के माता-पिता का नाम क्या था?

    माता का नाम वेदवती और पिता का नाम मध्यगेह भट्ट

  4. मध्वाचार्य ने संन्यास कब लिया?

    अपने 11वें वर्ष में

  5. मध्वाचार्य को किस देवता का अवतार माना गया है?

    वायु देवता का तीसरा अवतार

  6. मध्वाचार्य ने कितने वर्षों तक ग्रन्थ लेखन किया?

    30 वर्षों तक

  7. मध्वाचार्य ने कितने ग्रंथों की रचना की?

    37 ग्रंथों की

  8. मध्वाचार्य के अनुसार भजन के कितने प्रकार हैं?

    10

  9. मध्वाचार्य जी ने उडुपी में कितने मठों की स्थापना की?

    8

  10. मध्वाचार्य की मृत्यु कब हुई?

    1317 ईस्वी

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