रामायण के युद्ध में जब कुम्भकर्ण से शर्त हारे थे हनुमानजी

रामायण के बारे में आपने सुना ही है और पल पल की जानकारी आपको होगी ही। एक समय ऐसा भी था जब रावण को अपने भाई कुम्भकरण को उठाना पड़ा था। लेकिन जब कुम्भकरण मैदान पर आया तब उस समय वह एक ख़ास शर्त हनुमान जी से लगा बैठा और हनुमान जी वह शर्त हार गए।

लंका में युद्ध अपनी चरम सीमा पर था। श्री राम की सेना आगे बढ़ती जा रही थी और रावण के अनेकानेक महारथी रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। अब तक रावण भी समझ गया था कि श्री राम की सेना से जीतना उतना सरल कार्य नहीं है जितना वह समझ रहा है। उसने अपने छोटे भाई कुम्भकरण को जगाने का निर्णय किया। कुम्भकरण को ब्रह्म देव द्वारा एक ख़ास वरदान प्राप्त था कि वह छह महीने तक सोता रहेगा और छह महीने तक उठेगा।

कुम्भकरण जब नींद से जागा तो रावण ने उसे स्थिति से अवगत कराया। इस पर कुम्भकरण ने रावण को उसके कृत्य के लिए खरी खोटी सुनाई। लेकिन भाई की सहायता से वह पीछे नहीं हटा। जब वह रणभूमि में पहुंचा तो उसकी काया देखकर वानर सेना में खलबली मच गयी। उसने किसी और से युद्ध न कर सीधे श्री राम से युद्ध करने की ठानी। वह युद्ध भूमि में आगे बढ़ रहा था। पूरी वानर सेना भागने लगी।

सबसे पहले नल और फिर नील आकर कुम्भकरण से लड़े लेकिन वह भी परास्त हो गए। उसके बाद सुग्रीव और अंगद ने भी कुम्भकरण से युद्ध किया लेकिन वो भी हार गए। उसके बाद जामवंत आये, वो भी कुम्भकरण से हार गए। उसके बाद आये हनुमान जी। महाबली हनुमान का बल अपार था। उन्होंने युद्ध क्षेत्र में आकर कुम्भकरण को ललकारा। कुम्भकरण के विशालकाय शरीर के सामने बजरंगबली ने भी अपना विराट रूप धर लिया और फिर दोनों में महायुद्ध आरम्भ हुआ। दोनों की सेना रुक गयी और उन दोनों का युद्ध देखने लगी। आपस में लड़ते हुए दोनों को अपने प्रतिद्वंदियों के बल का आभास हुआ और दोनों ने मन ही मन एक दूसरे की सराहना की। जब युद्ध थोड़ा लम्बा चला तब कुम्भकरण ने हनुमान की प्रशंसा करते हुए कहा कि मेने आज तक तुम जैसे वीर का सामना नहीं किया और इस युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकलने वाला है।

बाद में युद्ध फिर से आरम्भ हुआ और हनुमान जी ने क्रोधित होकर पहाड़ उखाड़ लिया। तब कुम्भकरण ने हनुमान जी से कहा कि यदि मैं इस प्रहार से थोड़ा भी विचलित हुआ तो ये रणभूमि छोड़ दूंगा। और महाबली के इस प्रहार से कुम्भकरण तनिक भी नहीं हिला। इससे हनुमान जी काफी प्रभावित हुए और उन्होंने निर्णय लिया कि ये योद्धा तो श्री राम हाथों ही मृत्यु पाने के योग्य है। इसके बाद कुम्भकरण का युद्ध लक्ष्मण और श्री राम से हुआ।

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