गोवर्धन पूजा 2021 तिथि, मुहूर्त – गोवर्धन पूजा कैसे प्रारम्भ हुई? Govardhan Puja 2021 in Hindi

govardhan puja

भारत में हर युग की एक अपनी अलग विशेषता है, सतयुग सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के नाम से विख्यात है तो त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और द्वापरयुग में श्री कृष्ण लीला का समागम देखने को मिलता है। त्यौहार और व्रत हमारे देश में आस्था का प्रतीक हैं। अपने आप में अथाह आस्था और धार्मिक धारणाओं का समागम लिए हुए हैं एक पर्वत पूजा जिसे “गोवर्धन पूजा” के नाम से जाना जाता है।

गोवर्धन पूजा 2021 तिथि, मुहूर्त (Govardhan Puja 2021 in Hindi)

गोवर्धन पूजा 2021 तिथि:शुक्रवार, 05 नवंबर 2021
गोवर्धन पूजा प्रातः काल मुहूर्त:06:35 से 08:47 तक
गोवर्धन पूजा सायं काल मुहूर्त:15:21 से सायं 17:33 तक
प्रतिपदा तिथि प्रारंभ:02:44 AM (05 नवंबर 2021) से
प्रतिपदा तिथि समाप्त:11:14 PM (05 नवंबर 2021) तक

गोवर्धन पूजा कब मनाई जाती है?

दीपावली के ठीक अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का उत्सव मनाया जाता है। इस उत्सव को अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है। अन्नकूट अथवा गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण के अवतार के समय द्वापर युग से प्रारंभ हुई। यह ब्रजवासियों का एक प्रमुख त्यौहार है। इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा के साथ साथ मंदिरों में विविध प्रकार की खाद्य सामग्रियों से भगवान को भोग लगाया जाता है।

गोवर्धन पूजा में भारतीय संस्कृति के साथ साथ मानव एवं प्रकृति का एक अद्भुत समागम देखने को मिलता है। इस पर्व की कुछ अपनी अलग ही मान्यताएं हैं। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है।ऐसा माना जाता है गोवर्धन पर्वत अपने में सहस्त्रों गायों के अंश को समाहित रखता है और इस प्रकार पर्वत रुपी गोवर्धन की पूजा करने से हम पवीत्र गायों की पूजा करते हैं।

शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र है जिस प्रकार नदियों में “गंगा”। हमारी संस्कृति में गाय को माता की उपाधि देने के साथ साथ देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। जिस प्रकार देवी लक्ष्मी धन,सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी सबसे मत्वपूर्ण धन प्रदान करती हैं।

गाय का बछड़ा और बैल खेतों में अनाज उगाने में सहायक होते हैं। इस तरह गौ सम्पूर्ण मानव जाती के लिए पूजनीय और आदरणीय है। गाय माता के प्रति श्रद्धा भाव प्रकट करने के लिए कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की। यह परम्परा श्री कृष्ण काल से प्रारम्भ हुयी थी और तबसे अब तक निरंतर चली आ रही है।

पूजा का प्रचलन तबसे प्रारम्भ हुआ जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को देवराज इंद्र की मूसलधार वर्षा से बचाने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठाकर रखा और सम्पूर्ण बृजवासी उसकी छाया में सुरक्षित एवं सुखपूर्वक रहे क्यूंकि सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर जल की एक बूंद भी नहीं पड़ी। सातवें दिन वर्षा समाप्त होने पर भगवान् ने गोवर्धन को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की सलाह दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से भी मनाया जाने लगा।

गोवर्धन पूजा कैसे मनाएं?

1. दक्षिण भारत में इस दिन बलि पूजा, मार्गपाली आदि उत्सव भी मनाए जाते हैं। इस दिन गौ माता को स्नान कराके धूप-चंदन तथा पुष्प माला पहनाकर गाय का पूजन किया जाता है। इस दिन गौ माता को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारते हैं साथ ही साथ गौ माता की प्रदक्षिणा भी की जाती है।

2. इसके बाद घर के आंगन में गाय के गोबर से पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल, फूल,दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजा करते हैं और फिर उसकी परिक्रमा की जाती है। कुछ जगह गोवर्धन नाथ जी की प्रति-मूर्ति बनाकर पूजन करने का भी चलन है। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण को अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।

3. इस दिन भगवान के लिए चरणों में समर्पित करने हेतु निमित्त भोग बनाया जाता है जिन्हें ‘छप्पन भोग’ कहते हैं।छप्पन भोग में नियमित भोजन के अतिरिक्त कच्चे पक्के फल फूल भी शामिल किये जाते हैं।ऐसी धारणा है की अन्नकूट उत्सव को मनाने से मनुष्य को लंबी आयु एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है साथ ही दरिद्रताका नाश होकर मनुष्य जीवनपर्यंत सुखी और समृद्ध रहता है और मनुष्य के जीवन में अन्न को लेकर किसी भी प्रकार का दुःख समाहित नहीं होता।

ऐसी मान्यता की है कि इस दिन सुखी रहने वाला व्यक्ति जीवनपर्यन्त सुखी रहता है और दुखी रहने वाला व्यक्ति जीवनपर्यन्त दुखी। यूं तो हर प्रकार के व्रत और पूजा को सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ ही किया जाना चाहिए, पर अन्नकूट पूजा के लिए प्रसन्न मन और श्रद्धा को परम आवश्यक माना गया है।

गोवर्धन पूजा कैसे प्रारम्भ हुई?

अन्य सभी त्यौहारों और पूजन के समान गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में भी एक लोकगाथा प्रचलित है। कहते हैं एक बार देवराज इन्द्र को इस बात का अभिमान हो गया था की धरती पर कृषि और अन्न के उत्पादन हेतु उनके द्वारा की जाने वाली वर्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसी बात के अहंकार में मद इंद्रा पृथ्वी वासियों द्वारा अपनी पूजा हेतु वर्षा में विलम्ब करने लगे। इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण ने एक अद्भुद लीला रची।

प्रभु की इस लीला के तहत एक दिन उन्होंने देखा के सभी बृजवासी किसी बड़ी पूजा की तैयारी में जुटे हैं और उत्तम प्रकार के पकवान बना रहे हैं।यह सब देख भगवान् श्री कृष्ण ने माता यशोदा से जाकर पूछा की ये किस उत्सव की तैयारी हो रही है? माँ यशोदा ने बताया की आज भगवन इंद्र की पूजा का दिन है, देवराज इंद्र वर्षा के देवता माने जाते हैं और इसी वर्षा की वजह से हम अन्न प्राप्ति कर पाते हैं साथ ही साथ सभी पशुओं के लिए चारे का प्रबंध भी उन्हीं की वर्षा से संभव है।

श्री कृष्ण जानते थे की यही कारण है जिसकी वजह से देवराज इंद्र में इतना अभिमान है। अपनी माता की बात सुनने के बाद श्री कृष्ण बोले हे माता! देवराज इंद्र के स्थान पर तो हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं, इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए। जब यही बात श्री कृष्ण ने सम्पूर्ण बृजवासियों तथा पंडितो के समक्ष राखी तो सभी उनकी बात से सहमत हुए।

लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने देवराज इन्द्र के बदले गोवर्घन पर्वत की पूजा की। देवराज इन्द्र ने इसे अपना घनघोर अपमान समझा और अहंकार के मद में चूर होकर मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। अन्य देवताओं द्वारा जब देवराज इंद्रा को जब समझाने का प्रयत्न किया गया तो देवराज इंद्र ने सबकी बात यह कहकर अनसुनी कर दी की मनुष्य रूप में जन्म लेने के पश्चात श्री नारायण अपना स्वरुप खो चुके हैं और अभी वे एक साधारण मनुष्य हैं और साधारण मनुष्य की ही भाँती उन्हें अपने देवराज की पूजा अर्चना करनी चाहिए। 

प्रलय के समान वर्षा देखकर सभी बृजवासी भयभीत हो गए। पानी का उफान पानी चरम सीमा पर था, पशुओं को संभालना मुश्किल हो रहा था, मूसलाधार वर्षा से न जाने कितने घरों के अंदर पानी घुस गया था। तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और सम्पूर्ण बृजवासियों को गोवर्धन पर्वत के पास एकत्रित होने के लिए कहा। श्री कृष्ण ने स्वयं अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे़ समेत शरण लेने के लिए बुलाया।

इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए वर्षा के वेग को और यदा बढ़ा दिया। इन्द्र के मान मर्दन हेतु श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा दी की आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग को आज्ञा देकर कहा की आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें।

इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा कर अपने क्रोध का परिचय देते रहे, सात दिन की वर्षा के पश्चात उन्हे एहसास हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता अत: वे परम गुरु ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और सब वृतान्त कह सुनाया। ब्रह्मा जी ने इन्द्र को समझाया की आप जिस कृष्ण की बात कर रहे हैं वह भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं।

मनुष्य रूप में जन्म लेने के बाद भी चौंसठ कलाओं से परीपूर्ण हैं, ब्रह्मा जी के मुंख से यह सुनकर इन्द्र अत्यंत लज्जित हुए और श्री कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहंकार से वशीभूत हो भूल कर बैठा। आप दयालु और कृपालु हैं इसलिए मेरी भूल क्षमा करें। इसके पश्चात देवराज इन्द्र ने मुरलीधर की पूजा कर उन्हें भोग लगाया। इस पौराणिक घटना के बाद से ही गोवर्घन पूजा की जाने लगी। बृजवासी इस दिन गोवर्घन पर्वत की पूजा करते हैं। गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है।

गोवर्धन पूजा का महत्त्व

कहा जाता है कि भगवान कृष्ण का इंद्र के अहंकार को तोड़ने के पीछे उद्देश्य ब्रज वासियों को गौ धन एवं पर्यावरण के महत्त्व को बतलाना था। ताकि वे उनकी रक्षा करें। आज भी हमारे जीवन में गौ माता का विशेष महत्त्व है। आज भी गौ द्वारा प्राप्त दूध हमारे जीवन में बेहद अहम स्थान रखता है। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती जैसे नदियों में गंगा।

गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। गोवर्धन पूजा के दौरान विभिन्न तरह के पकवान बनाए जाते हैं। लोग घरों में गोवर्धन पूजा के दिन पूजा-अर्चना के बाद अन्नकूट का प्रसाद ग्रहण करते हैं। मंदिरों में इस पर्व पर विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।

यूं तो आज गोवर्धन पर्वत ब्रज में एक छोटे पहाड़ी के रूप में हैं, किन्तु इन्हें पर्वतों का राजा कहा जाता है। ऐसी संज्ञा गोवर्धन को इसलिए प्राप्त है क्योंकि यह भगवान कृष्ण के समय का एक मात्र स्थाई व स्थिर अवशेष है। उस काल की यमुना नदी जहाँ समय-समय पर अपनी धारा बदलती रहीं, वहीं गोवर्धन अपने मूल स्थान पर ही अविचलित रुप में विद्यमान रहे। गोवर्धन को भगवान कृष्ण का स्वरुप भी माना जाता है और इसी रुप में इनकी पूजा की जाती है। गर्ग संहिता में गोवर्धन के महत्त्व को दर्शाते हुए कहा गया है – गोवर्धन पर्वतों के राजा और हरि के प्रिय हैं। इसके समान पृथ्वी और स्वर्ग में दूसरा कोई तीर्थ नहीं।

गोवर्धन पर्वत, वर्तमान में

गोवर्धन पर्वत उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अंतर्गत आता है। गोवर्धन के आस पास की समस्त भूमि प्राचीनकाल से ही बृजभूमि के नाम से विख्यात है। यह भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरुप की लीलास्थली है। यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ब्रजवासियों को इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिये गोवर्धन पर्वत अपनी कनिष्ठ अंगुली पर उठाया था। गोवर्धन पर्वत को  गिरिराज जी कहकर भी स्थानीय निवासियों एवं भक्तों द्वारा सम्बोधित किया जाता है। यहां दूर-दूर से भक्तजन गिरिराज जी की परिक्रमा करने आते रहे हैं। यह सात कोस की परिक्रमा लगभग इक्कीस किलोमीटर की है। मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख स्थल कुसुम सरोवर, मानसी गंगा,आन्यौर, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लौठा,जतिपुरा राधाकुंड, दानघाटी इत्यादि हैं।

परिक्रमा का आरम्भ जहाँ से किया जाता है वहीं पर एक प्रसिद्ध मंदिर भी है जिसे दानघाटी मंदिर कहा जाता है।

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