क्यों गंगा ने अपने 7 पुत्रों को जल में बहाया?

कोई धर्म (पांडवो) के साथ था तो कोई अधर्म (कौरवों) के साथ था। अंत में धर्म की जीत हुई पृथ्वी पुनःअधर्म मुक्त हो गई। महाभारत हमारे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। महाभारत की कहानियाँ बहुत ही प्रेरणादायक हैं। पूरे विश्व में महाभारत जैसा अद्भुत ग्रन्थ कोई नहीं हैं। महाभारत ग्रन्थ से जुड़ी हजारो रहस्यमयी कहानियो में से एक आपको बताने जा रहे हैं।

हिन्दू धर्म में गंगा नदी बहुत ही पूजनीय मानी जाती हैं। गंगा नदी को माता के नाम से सम्बोधित किया जाता हैं। गंगा नदी को मोक्षदायिनी कहा जाता हैं। माता गंगा से जुड़े अनेक पौराणिक कहानिया हैं। सदियों से माता गंगा अपने अविरल धारा से लोगो को और पृथ्वी को तृप्त कर रही हैं। महाभारत के सबसे सम्मान्नित पात्र महामहिम भीष्म माता गंगा और महाराज शांतनु के ही पुत्र थे। महाराज शांतनु और गंगा के आठवे पुत्र देवव्रत हुये थे यही देवव्रत आगे चलकर भीष्म नाम से प्रचलित हुये। कहा जाता हैं की भीष्म जैसा बलशाली उस काल में पुरे आर्यव्रत में कोई भी नहीं था। भीष्म बिना युद्ध लड़े ही सिर्फ अपने नाम से ही बड़े-बड़े राज्यों को अपने सामने झुका लेते थे। उनकी भीष्म प्रतिज्ञा ने उन्हें एक आदर्श पुत्र के रूप में स्थापित किया हैं।

ब्रह्मा जी का श्राप:

महाभारत के आदि पर्व के अनुसार राजा दुष्यंत और शंकुन्तला के गन्धर्व विवाह से भरत जी का जन्म हुआ यह वही भरत हैं जिनके नाम पर अपने देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। भरत एक महान प्रतापी राजा थे तथा अपने प्रजा की सेवा बड़े ईमानदारी पूर्वक करते थे।

भरत के पाँच पुत्र थे लेकिन उनमे किसी में भी राजा बनने के गुण नहीं थे इसीलिए भरत जी ने बृहस्पति के पुत्र विरथ को अपना उत्तराधिकारी बनाया इन्ही विरथ की चौदहवी पीढ़ी में शांतनु का जन्म हुआ। शांतनु का जन्म भी एक श्राप की वजह से हुआ था। महाराज शांतनु कौरवों और पांडवो के परदादा थे।

पिछले जन्म में शांतनु इक्ष्वाकु वंश के राजा महाभिषक थे जो बहुत धर्मी तथा तपस्वी थे अपने कठिन तपस्या और धार्मिक आचरणों के चलते वो ब्रह्मलोक में गए। एक बार ब्रह्मलोक में महाभिषक अपने स्थान पर बैठे थे ब्रह्मा जी भी यथा स्थान पर विराजमान थे तभी वहा गंगा माता आई गंगा माता का दिव्य तेज को देखकर महाभिषक एकटक उनको घूरते रहे जबकी स्त्री को घूरना असभ्यता का प्रतिक माना जाता हैं।

महाभिषक को इस प्रकार एक स्त्री को घूरने की वजह से गंगा को भी क्रोध आ गया तथा ब्रह्मा जी ने महाभिषक को श्राप दिया की तुम ब्रह्मलोक में रहने लायक नहीं हो तुम मनुष्य योनि में पृथ्वी लोक पर जन्म लोगे। ब्रह्मा जी के इस श्राप को सुनकर गंगा को अत्यंत हर्ष और गर्व के कारण अहंकार हो गया। ब्रह्मा जी ने गंगा के नेत्रों में अहंकार को भांप लिया और गंगा को भी मनुष्य योनि में जन्म लेकर अहंकाररहित होने की सजा सुनायी। ब्रह्मा जी का श्राप सुन कर महाभिषक को बहुत दुःख हुआ। यही महाभिषक पृथ्वी लोक पर कुरु वंश में विरथ के चौदहवे पीढ़ी में शांतनु के रूप में जन्म लिया।

एक बार शांतनु के पिताजी महाराजा प्रताप गंगा तट पर तपस्या कर रहे थे। महाराज प्रताप के मुख मंडल और तेज को देखकर गंगा उन पर मोहित हो गई तथा उन्होंने अपना जल स्तर बढ़ा दिया और महाराज प्रताप के दाहिने पैर को स्पर्श करते हुवे स्त्री रूप में प्रकट हुई और महाराज प्रताप से विवाह का निवेदन किया। महाराज प्रताप ने कहा “हे गंगे! धर्मपत्नी तो वाममांगी होती हैं तुम तो दाहिने पैर पर विराजमान हो गई हो वह तो पुत्रवधु का स्थान होता हैं”।महाराज प्रताप के मुख से इस प्रकार का वचन सुनकर गंगा वहाँ से अंतर्ध्यान हो गई। कुछ समय पश्चात् महाराज प्रताप के एक पुत्र हुये जिनका नाम पड़ा शांतनु। एक बार शांतनु गंगा नदी किनारे शिकार खेलने गए। शिकार का पीछा करते-करते उनको बहुत जोर से प्यास लगी वो जैसे ही गंगातट पर अपना प्यास बुझाने गए की वहा एक अति सुन्दर स्त्री को खड़ा पाया वह स्त्री देवलोक की जान पड़ती थी।

वह स्त्री कोई और नहीं गंगा ही थी। महाराज शांतनु सुन्दर स्त्री देख कर मोहित हो गए था महाराज शांतनु ने उनसे विवाह करने का अनुरोध किया। गंगा ने भी हामी भर दी लेकिन उन्होंने शांतनु के सामने एक शर्त रखी की जब तक आप वह शर्त मानेंगे तभी तक मै आपके पास रहूँगी जिस दिन शर्त टूट गया उस दिन मै हमेशा के लिए आपको छोड़ कर चली जाउंगी।गंगा ने यह शर्त राखी की महाराज शांतनु कभी कोई प्रश्न नहीं करेंगे चाहे गंगा कुछ भी क्यों न करे। महाराज शांतनु ने ख़ुशी-ख़ुशी गंगा के इस शर्त को मान लिया तथा जीवनभर कोई प्रश्न नहीं पूछने का वचन दिया। उसके बाद महाराज शांतनु और गंगा का विवाह हो गया। दोनों खुशी-ख़ुशी सुखपूर्वक जीवन साथ-साथ बिताने लगे। महाराज शांतनु कभी कोई प्रश्न गंगा माता से नहीं करते और माता गंगा भी सदैव महाराज शांतनु के साथ रहने लगी।

समय बीतता गया समय के साथ महाराज शांतनु और माता गंगा को प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। महाराज शांतनु बहुत खुश हुवे उनका उत्तराधिकारी ने जन्म ले लिए था लेकिन महाराज शांतनु का यह ख़ुशी ज्यादा समय तक नहीं रहा उन्होंने देखा की गंगा ने पहले पुत्र को नदी में प्रवाह कर दिया। चुकी महाराज शांतनु गंगा से कभी भी प्रश्न न करने का वचन दिया था इसीलिए उन्होंने गंगा से विलग होने के मोह में कुछ नहीं कहा और अपना सारा दुःख सह गए।ऐसे ही सात साल बीत गए इन सात सालो में गंगा और शांतनु से सात संतान उत्पन्न हुये सातो पुत्रो को गंगा ने अपने ही हाथो नदी में बहा दिया। शांतनु महाराज अपने पुत्रो को उसकी माता द्वारा इस प्रकार से नदी में बहा देना अत्यंत कष्टकारक होने लगा उनके लिए गंगा का यह कर्म असहनीय हो गया।

आठवे साल महाराज शांतनु और गंगा को अठवा पुत्र का जन्म हुआ गंगा पहले की तरह इस बार भी आठवे पुत्र को अपने गोद में उठा लिया और नदी में प्रवाहित करने के लिए चल पड़ीं लेकिन इस बार महाराज ने अपने वचन को तोड़ कर गंगा का हाथ पकड़ लिया और उनसे प्रश्न किया की आखिर उसने क्यों उनके सभी पुत्रो को नदी में प्रवाहित कर रही हैं ?महाराज को अपना वचन तोड़ के प्रश्न करते हुवे देख कर गंगा ने आठवे पुत्र को नदी में प्रवाहित नहीं किया तथा शांतनु से बोली महाराज आपने अपना वचन तोडा मुझे भी अपने वचन अनुसार आपको छोड़ कर जाना होगा। लेकिन यह आपका आठवां पुत्र देवव्रत को भी अपने साथ ले जा रही हूँ इसका पालन-पोषण एक माँ की तरह करुँगी और जब यह वीर योद्धा, ज्ञानी हो जाएगा तो आपके पास आपके पुत्र को पहुँचा दूंगी। इतना कहकर गंगा जाने लगी तभी महाराज ने कहा इतना तो बता दो की तुमने आखिर क्यों मेरे सातो पुत्रो को जलसमाधि दे दी गंगा ने जाते-जाते विष्णुवतार पृथु के आठ पुत्रो को ऋषि वशिष्ठ के श्राप की कहानी सुनाई और बताया की उन्ही वसुओं की मुक्ति के लिए मैंने उन सात पुत्रो को जलसमाधि देना पड़ा।

आठवा पुत्र घौ नाम का वसु हैं जिसको श्राप मिला हैं की वह लम्बे समय तक मनुष्य योनि में पृथ्वी पर मनुष्य योनि के दुःख को भोगते हुवे व्यतीत करेगा यह वही अठवा वसु का महर्षि वशिष्ठ के श्राप के कारन देवव्रत के रूप में पुनर्जन्म हुआ हैं।

अठारह वर्ष पश्चात एक बार शांतनु महाराज गंगा नदी किनारे टहल रहे थे और गंगा की पानी को देख कर गंगा और अपने पुत्र देवव्रत को हृदय से याद किया तभी गंगा अपने पुत्र देवव्रत के साथ महाराज शांतनु के सामने प्रकट हुई और बोली महाराज आपका पुत्र अब एक वीर योद्धा हो चूका हैं।राज चलाने में यह अब निपूर्ण हैं वचन के अनुसार यह पुत्र को मै आपके पास ही छोड़ के जा रही हूँ और इतना कहकर गंगा हमेशा के लिए अंतर्ध्यान हो गई।

आठ वसुओं के श्राप की कहानी: महाभारत के अदि पर्व के अनुसार प्राचीन समय में मेरु पर्वत पर ऋषि वशिष्ठ का आश्रम था ऋषि वशिष्ट के पास कामधेनु समान एक गाय थी जिसका नाम नन्दनी था जो सभी प्रकार के इक्षित फल प्रदान करने वाली थी। एक बार घौ आदि वसु अपनी पत्नियों के साथ मेरु पर्वत पर घूम रहे थे।

घौ नाम का वसु उस नन्दनी गाय को देखकर मोहित हो गया तथा अन्य वसुओं के साथ मिलकर जब ऋषि वशिष्ठ ध्यानमग्न में थे तो उनके नन्दनी गाय को अपनी पत्नी के लिए हर ले गये।घौ इस गाय को अपने पत्नी को उपहार स्वरुप देना चाहते थे। जब महर्षि वशिष्ठ को इस बात का पता चला तो वो क्रोधित होकर सभी वसुओं को श्राप दिया की तुम सब मनुष्य योनि में पृथ्वी पर जन्म लोगे और मनुष्यो के दुःख को भोगोगे। इस श्राप के बाद सभी वसु महर्षि वशिष्ठ से क्षमा-याचना माँगने लगे। महर्षि लोग तो होते ही दयालु हैं।

महर्षि वशिष्ठ ने इनके श्राप को माफ़ करते हुवे कहा की तुम सातो वसुओं को तो तुरंत ही मनुष्य योनि से मुक्ति मिल जाएँगी लेकिन यह घौ नामक वसु मनुष्य रूप में लम्बे समय तक पृथ्वी पर वास करेगा और मनुष्य योनि के दुःख-सुख का भोग करेगा।फिर सभी वसु माता गंगा से अनुनय-विनय प्रार्थना किया की इस श्राप से मुक्ति का कोई रास्ता बताये ? फिर माँ गंगा ने उन सभी वसुओं के प्रार्थना से प्रसन्न हो कर उनको अपने पुत्र रूप में जन्म देने का और तुरंत ही मुक्ति देने का आशीर्वाद दिया।माता गंगा ने महाराज शांतनु से कभी भी प्रश्न न करने का वचन लेकर एक-एक कर सात वसुओं को नदी में प्रवाहित करके मानवयोनि से मुक्ति दुलाई जिससे सातो वसु वापस देवलोक को लौट आए लेकिन आठवे वसु अपने श्राप के कारण लम्बे समय तक पृथ्वी पर भीष्म के रूप में वास किया और इक्षामृत्यु द्वारा देव लोक को प्राप्त हुये।

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