तालिबान क्या है? तालिबान का जन्म कैसे हुआ?

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तालिबान को इस दुनिया में आतंकवाद की नज़र से देखा जाता है, लेकिन फिर भी अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के रहते हुए तालिबान का सफाया नहीं हो सका। आतंकवाद पोर्री दुनिया के लिए बहुत ही बड़ा ख़तरा है, लेकिन तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा करते हुए पूरी दुनिया बस मूक दर्शक बनी हुई है। तालिबान के प्रभाव में भविष्य में अफगानिस्तान की सरकार कैसे चलेगी, यह देखने वाली बात होगी। इस लेख में आपको तालिबान के जन्म से लेकर उसकी कमाई के प्रमुख जरिये और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ जानने को मिलेंगी।

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तालिबान क्या है?

तालिबान, जिसको तालेबान भी कहा जाता है, एक सुन्नी इस्लामिक कट्टरपंथी आधारवादी आन्दोलन है। तालिबान शब्द पश्तो भाषा का है, जिसका अर्थ होता है ‘स्‍टूडेंट’ यानी कि ‘छात्र’, अर्थात ऐसे छात्र जो इस्लामिक विचारधारा पर यकीन करते हैं और कट्टरता से इसका पालन करते हैं। तालिबान का जन्‍म सबसे पहले उत्तरी पाकिस्तान में हुआ था, जिसकी शुरुआत मदरसे से हुई थी। मुख्य रूप से तालिबान 1994 में दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान में अस्तित्व में आया।

तालिबान का जन्म कैसे हुआ?

अमेरिका और सोवियत संघ के बीच 1950 से 1990 के दशक के दौरान शीत युद्ध चला और ये दोनों ही देश वैचारिक और भौगोलिक स्तर पर अपना विस्तार करना चाह रहे थे। 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया, जिसके जवाब में अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन का सहारा लिया और उसे स्थानीय लोगों को सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया।

इसी दौरान अफगान मुजाहिदीन का गठन हुआ, जिसका एकमात्र लक्ष्य सोवियत सेना को अपने देश से बाहर खदेड़ना था। अमेरिका और पाकिस्तान के द्वारा भारी मात्रा में महंगे से महंगे सैन्य उपकरण और आर्थिक सहयोग इन मुजाहिदीनों को पहुंचाए जा रहे थे। इस युद्ध में मुजाहिदीनों द्वारा सोवियत सेना को भारी नुकसान हो रहा था। इस कारण सोवियत संघ को मजबूरन अफगानिस्तान को छोड़ना पड़ा।

इसके बाद 1994 में अफगान मुजाहिदीन का ही एक अंग तालिबान देश में उभरा, जिसकी स्थापना मुल्ला मोहम्मद उमर ने की। वैसे तो तालिबान का उदय 90 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में माना जाता है, लेकिन पश्तूनों के नेतृत्व में उभरा तालिबान पहली बार दक्षिणी अफगानिस्तान में 1994 में सामने आया।

आखिर क्यों अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना को वापिस बुला दिया?

अमेरिका पर लादेन द्वारा किये गए 9/11 हमले के बाद अमेरिका ने अपने सैनिकों को अफगानिस्तान भेजने का निर्णय लिया। अमेरिका के रक्षा मंत्रालय के अनुसार अफगानिस्तान युद्ध पर साल 2001 से सितंबर 2019 के बीच 778 अरब डॉलर खर्च हुए। 2001 में तालिबान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू होने के बाद से 2300 से अधिक अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में जान गंवा चुके हैं जबकि 20660 सैनिक लड़ाई के दौरान घायल भी हुए हैं।

साल 2018 में तालिबान और अमेरिका के साथ बातचीत शुरू हुई और फरवरी 2020 में कतर की राजधानी दोहा में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ। जहां अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाने की प्रतिबद्धता जताई और तालिबान अमेरिकी सैनिकों पर हमले बंद करने को तैयार हुआ।

इस समझौते में तालिबान ने अपने नियंत्रण वाले इलाके में अल कायदा और दूसरे चरमपंथी संगठनों के प्रवेश पर पाबंदी लगाने की बात भी कही और राष्ट्रीय स्तर की शांति बातचीत में शामिल होने का भरोसा भी दिया। लेकिन इसके बावजूद समझौते के अगले साल से ही तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के आम नागिरकों और सुरक्षा बल को निशाना बनाना जारी रखा।

क्या तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान में कब्जा कर लिया है?

तालिबान के द्वारा अफगानिस्तान के काफी बड़े हिस्से पर कब्जा किया जा चुका है और यह अब पूरे अफगानिस्तान पर पैर पसारने की ओर देख रहा है। तालिबान के द्वारा काबुल सहित उत्तरी हिस्से में कब्जा किया जा चुका है।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर क्यों भागे?

काबुल में तालिबान के घुसते ही अशरफ गनी प्रेसीडेंट पैलेस छोड़कर चले गये। अशरफ गनी ने फेसबुक पर अपनी एक पोस्ट में दावा किया कि उन्होंने देश में खूनखराबा और तबाही रोकने के लिए अफगानिस्तान छोड़ा है।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर कहाँ चले गये?

संयुक्त अरब अमीरात ने माना है कि अशरफ गनी और उनका परिवार संयुक्त अरब अमीरात में ही रह रहा है। UAE का कहना कि मानवीय आधार पर गनी को रखा गया है। मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि यूएई की राजधानी अबू धाबी में गनी को देखा गया है। अशरफ गनी पर अफगान जनता बेहद नाराज है जिसे वह कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन के डर के बीच छोड़कर चले गए हैं।

तालिबान के कब्जे वाले शहर काबुल में अफगानी सेना का क्या हुआ?

तालिबान के प्रवक्ता ने ऐलान कर दिया कि वे शहर में घुसकर कानून-व्यवस्था और पुलिस चौकियों को संभालने जा रहे हैं। इसके साथ ही तालिबान ने हालांकि सेना और आम नागरिकों को सुरक्षा का भरोसा दिलाया कि किसी से बदला नहीं लिया जाएगा।

तालिबान के राष्ट्रपति अशरफ गनी अपने साथ कितना पैसा ले गये और कैसे ले गये?

काबुल स्थित रूसी दूतावास का हवाला देते हुए रूस की सरकारी समाचार एजेंसी ‘तास’ के अनुसार अशरफ गनी नकदी से भरा हेलिकॉप्टर लेकर काबुल से भाग गए थे। रिपोर्ट के मुताबिक चार कारें नकदी से भरी हुई थीं और उन्होंने सारा पैसा हेलिकॉप्टर में भरने की कोशिश की, लेकिन सारी नकदी हेलिकॉप्टर में नहीं भरी जा सकी और उन्हें कुछ नकदी रनवे पर ही छोड़नी पड़ गई।

ताजिकिस्तान में अफगानिस्तान के राजदूत मोहम्मद जहीर अगबर ने दावा किया है कि राष्ट्रपति अशरफ गनी जब अफगानिस्तान से भागते समय अपने साथ 16.9 करोड़ डॉलर (यानी करीब 12.67 अरब रुपये) ले गए थे। राजदूत ने कहा कि गनी को गिरफ्तार करके अफगान राष्ट्र की संपत्ति को फिर से वापस लाना चाहिए।

तालिबान की कमान वर्तमान में किसके हाथों में है?

तालिबान के चीफ अख्तर मंसूर की 2016 में अफगान-पाकिस्तान सीमा के पास अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत हो जाने के बाद तालिबान की कमान हिबतुल्लाह अखुंदजादा को सौंपी गयी और वर्तमान में भी तालिबान की कमान हिबतुल्लाह अखुंदजादा के पास ही है। इसको तालिबान के वफादार नेताओं के रूप में जाना जाता है। अखुंदजादा इस्लामी कानूनी का बड़ा विद्वान होने के साथ तालिबान का सर्वोच्च नेता है। तालिबान के राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य मामलों पर अंतिम फैसला हिबतुल्लाह अखुंदजादा ही करता है।

अफगानिस्तान में तालिबान की मजबूती का मुख्य कारण क्या है?

तालिबान की मजबूती का प्रमुख कारण अफगानिस्तान का अक्षम नेतृत्व, कमजोर व भ्रष्ट सेना है। जानकारों के अनुसार अफगानिस्तान में स्थानीय पुलिस से लेकर सेना में भयानक भ्रष्टाचार था, जिसने वहां की शासन प्रणाली को काफी कमज़ोर कर दिया था।

इसके अलावा अमरीकी सेना की वापसी से तालिबान का हौसला अब और भी ज्यादा बढ़ चुका है। तालिबानी आतंकवादियों की संख्या में लगातार इजाफा होने से यह मजबूत होता जा रहा है। इसके साथ ही तालिबान को पाकिस्तान का खुला एवं चीन का मौन समर्थन प्राप्त है।

तालिबान अब पूरे अफगानिस्तान को कैसे चलाएगा?

तालिबान के द्वारा अफगानिस्तान में जब तक अपनी नई सरकार का गठन नहीं किया जाता, तब तक एक काउंसिल के जरिए पूरे देश को चलाया जाएगा। तालिबानी अभी अफगानिस्तान के नेताओं, सेना के अफसरों से चर्चा जारी रखेंगे और नई सरकार के फ्रेमवर्क पर काम किया जाएगा। लेकिन अभी काउंसिल ही अफगानिस्तान को चलाएगी, इसकी अगुवाई हैबतुल्ला अखुंदजादा कर सकते हैं।

समूह के नीति निर्माण से जुड़े रहने वाले नेता वाहीदुल्लाह हाशिमी ने कहा कि तालिबान अफगान सेना के पूर्व पायलट्स और सैनिकों को भी अपने समूह में जोड़ेगा। हाशिमी ने रेखांकित किया कि तालिबान का शासन मॉडल 1996-2001 के कार्यकाल जैसा ही होगा। हाशिमी ने यह भी कहा कि एक नए राष्ट्रीय बल का गठन किया जाएगा, जिसमें इसके लड़कों के साथ ही अफगानी सैनिकों को भी भर्ती किया जाएगा।

तालिबान कितना अमीर है और कहाँ से पैसा लाता है?

एक अनुमान के मुताबिक, तालिबान ने 2019-20 में 1.6 बिलियन डॉलर कमाए। तालिबान की कमाई के मुख्‍य जरिए इस प्रकार हैं:

  • ड्रग्‍स: हर साल 416 मिलियन डॉलर
  • खनन: पिछले साल 464 मिलियन डॉलर
  • रंगदारी: 160 मिलियन डॉलर
  • चंदा: 2020 में 240 मिलियन डॉलर
  • निर्यात: हर साल 240 मिलियन डॉलर
  • रियल एस्‍टेट: हर साल 80 मिलियन डॉलर
  • दोस्‍तों से मदद: रूस, ईरान, पाकिस्‍तान और सऊदी अरब जैसे देशों से 100 मिलियन डॉलर से 500 मिलियन डॉलर के बीच सहायता

ओसामा बिन लादेन का तालिबान से क्या है रिश्ता?

जब अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ था तो इसका आरोप अलकायदा पर लगा था जिसका चीफ ओसामा बिन लादेन था। इसके बाद आरोप लगा कि लादेन ने अफगानिस्तान में शरण ली है और ये शरण तालिबान ने दी है।

अमेरिका ने तालिबान से लादेन को पकड़ने के लिए मदद करने को कहाँ लेकिन तालिबान ने मना कर दिया, जिसके बाद अमेरिकियों ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया और तालिबान को उखाड़ फेंका।

क्या अमेरिका द्वारा तालिबान पर हमला किया जा सकता है?

अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान में रहते हुए भी जब तालिबान पर ऐसा हमला नहीं हो पाया कि तालिबान ख़त्म हो सके तो अब भविष्य में तालिबान पर हमले की आशंका ना के बराबर है। हांलाकि अमेरिका ने तालिबान को चेतावनी दी है कि अगर उसने अमेरिकी कर्मियों पर हमला किया या देश में उनके अभियानों में बाधा पहुंचायी, तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई जरूर करेगा। अमेरिका ने अब अफगानिस्तान को उनके हाल पर छोड़ दिया है, अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या तालिबान को एक देश के रूप में विश्व स्वीकार करता है या नहीं?