हिंदी दिवस कब मनाया जाता है? World Hindi Day, History

हिंदी दिवस

संक्षिप्त परिचय

हिंदी दिवस कब मनाया जाता है? भारत विश्वभर में अपनी “अनेकता में एकता” के लिए जाना जाता है। इसके अलावा भारत अपनी विविधताओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्द है। यहाँ पर सभी धर्मों का सामान भाव से सम्मान किया जाता है। विविधताओं से परिपूर्ण इस देश में ना सिर्फ अलग अलग प्रकार के धर्मों को समान महत्व दिया जाता है अपितु भिन्न भिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न भाषाओँ और बोलियों का प्रचलन है।

कर्नाटक में कन्नड़, तमिलनाडु में तमिल, पंजाब में पंजाबी तो राजस्थान में राजस्थानी भाषा का प्रयोग किया जाता है। इन सभी भाषाओँ में एक भाषा ऐसी है जिसे भारत में सबसे ज़्यादा बोला जाता है, भाषा है “हिंदी”। हिंदी भारत में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा है। हिंदी भाषा के सर्वाधिक प्रचलन के कारण देश में हिंदी दिवस भी मनाया जाता है।

हिंदी दिवस का इतिहास (Hindi Diwas History)

हिंदी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाता है। वर्ष 1918 में गांधी जी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यह भी माना जाता है कि 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी के पुरोधा व्यौहार राजेन्द्र सिंहा का 50-वां जन्मदिन था, जिन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए।

हिंदी दिवस का उद्देश्य

इसका मुख्य उद्देश्य वर्ष में एक दिन इस बात से लोगों को रूबरू कराना है कि जब तक वे हिन्दी का उपयोग पूरी तरह से नहीं करेंगे तब तक हिन्दी भाषा का विकास नहीं हो सकता है। इस एक दिन सभी सरकारी कार्यालयों में अंग्रेज़ी के स्थान पर हिन्दी का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा जो वर्ष भर हिन्दी में अच्छे विकास कार्य करता है और अपने कार्य में हिन्दी का अच्छी तरह से उपयोग करता है, उसे पुरस्कार द्वारा सम्मानित किया जाता है। बहुत से सरकारी संस्थानों में हिंदी भाषा में अधिकारी पद पर भी नियुक्ति की जाती है, जिनका उद्देश्य हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के विभिन्न माध्यमों को ढूँढना होता है।

अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रचलन के कारण हिंदी भाषा का अस्तित्व लुप्त हो रहा है। वाराणसी में स्थित दुनिया में सबसे बड़ी हिन्दी संस्था आज बहुत ही खस्ता हाल में है। इस कारण इस दिन उन सभी से निवेदन किया जाता है कि वे अपने बोलचाल की भाषा में भी हिन्दी का ही उपयोग करें। इसके अलावा लोगों को अपने विचार आदि को हिन्दी में लिखने भी कहा जाता है। चूंकि हिन्दी भाषा में लिखने हेतु बहुत कम उपकरण के बारे में ही लोगों को पता है, इस कारण इस दिन हिन्दी भाषा में लिखने, जाँच करने और शब्दकोश के बारे में जानकारी दी जाती है।

राजभाषा सप्ताह

राष्ट्रभाषा सप्ताह 14 सितम्बर को हिंदी दिवस से एक सप्ताह के लिए मनाया जाता है। इस पूरे सप्ताह अलग अलग प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। यह आयोजन विद्यालय और कार्यालय दोनों में किया जाता है। इसका मूल उद्देश्य हिन्दी भाषा के लिए विकास की भावना को लोगों में केवल हिन्दी दिवस तक ही सीमित न कर उसे और अधिक बढ़ाना है। इन सात दिनों में लोगों को निबंध लेखन, आदि के द्वारा हिन्दी भाषा के विकास और उसके उपयोग के लाभ और न उपयोग करने पर हानि के बारे में समझाया जाता है।

हिंदी दिवस पर दिए जाने वाले पुरस्कार

हिंदी दिवस पर हिन्दी के प्रति लोगों को उत्साहित करने हेतु पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है। जिसमें कार्य के दौरान अच्छी हिन्दी का उपयोग करने वाले को यह पुरस्कार दिया जाता है। यह पहले राजनेताओं के नाम पर था, जिसे बाद में बदल कर राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार और राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार कर दिया गया। राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार लोगों को दिया जाता है जबकि राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार किसी विभाग, समिति आदि को दिया जाता है।

राजभाषा गौरव पुरस्कार

यह पुरस्कार तकनीकी या विज्ञान के विषय पर लिखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को दिया जाता है। इसमें दस हजार से लेकर दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार होते हैं। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को 2 लाख रूपए, द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को डेढ़ लाख रूपए और तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को पचहत्तर हजार रुपये मिलता है। साथ ही दस लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में दस-दस हजार रूपए प्रदान किए जाते हैं। पुरस्कार प्राप्त सभी लोगों को स्मृति चिह्न भी दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाना है।

राजभाषा कीर्ति पुरस्कार

इस पुरस्कार योजना के तहत कुल 39 पुरस्कार दिये जाते हैं। यह पुरस्कार किसी समिति, विभाग, मण्डल आदि को उसके द्वारा हिन्दी में किए गए श्रेष्ठ कार्यों के लिए दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिन्दी भाषा का उपयोग करने से है।

इन सभी पुरस्कारों के अलावा देश के भिन्न भिन्न संस्थानों में भी निजी रूप से हिंदी भाषा समुचित प्रयोग करने वालो को,एवं भाषा के विस्तार के लिए अतुलनीय कार्य करने वालों को विशेष रूप से सम्मानित किया जाता है। बैंक में विशेष रूप से राज भाषा अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है।

हिन्दी दिवस में कार्यक्रम

हिंदी दिवस के दौरान कई कार्यक्रम होते हैं। इस दिन छात्र-छात्राओं को हिन्दी के प्रति सम्मान और दैनिक व्यवहार में हिन्दी के उपयोग करने आदि की शिक्षा दी जाती है। जिसमें हिन्दी निबंध लेखन, वाद-विवाद हिन्दी टंकण प्रतियोगिता आदि होता है।हिन्दी दिवस पर हिन्दी के प्रति लोगों को प्रेरित करने हेतु भाषा सम्मान की शुरुआत की गई है।

यह सम्मान प्रतिवर्ष देश के ऐसे व्यक्तित्व को दिया जाएगा जिसने जन-जन में हिन्दी भाषा के प्रयोग एवं उत्थान के लिए विशेष योगदान दिया है। इसके लिए सम्मान स्वरूप एक लाख एक हजार रुपये दिये जाते हैं।हिन्दी में निबंध लेखन प्रतियोगिता के द्वारा कई जगह पर हिन्दी भाषा के विकास और विस्तार हेतु कई सुझाव भी प्राप्त किए जाते हैं।

हिंदी भाषा को कैसे मनाया जाता है, इसका क्या उद्देश्य है, हिंदी दिवस कब इतिहास में सम्मिलित हुआ इसके बारे में तो हम सबने जान लिया अब जानते हैं उस आंदोलन के बारे में जिसके सफल होने के बाद ही हिंदी दिवस को हमारे संविधान में जगह मिली। हिंदी दिवस को संविधान में सम्मिलित करने के लिए अनेक क्रांतिकारियों द्वारा आंदोलन किया गया,आइये जानते हैं उस आंदोलन का एक परिचय कि कैसे उस आंदोलन की शुरआत की गयी और क्यों?

हिन्दी आन्दोलन भारत में हिन्दी एवं देवनागरी को विविध सामाजिक क्षेत्रों में आगे लाने के लिये विशेष प्रयत्न हैं। इस आन्दोलन में साहित्यकारों, समाजसेवियों एवं स्वतंत्रतता संग्राम-सेनानियों का विशेष योगदान था।

हिन्दी आन्दोलन परिचय

भारतेन्दु के समय में हिन्दी की स्थिति बड़ी विकट हो गयी थी। अंग्रेज अपने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के अनुसार अल्पसंख्यकों को बढ़ावा देते थे। वे हिन्दी के राह में तरह-तरह के रोड़े अटकाते थे। उर्दू-प्रेमी साहित्यकार नयी हिन्दी को अपने लिये बहुत बड़ा खतरा मानते थे। इसके अतिरिक्त हिन्दी के रूढ़िवादी साहित्यकार पुरानी काव्य-परम्पराओं से चिपके हुए थे। वे आधुनिक हिन्दी में गद्य के विकास के प्रति उदासीन थे।

सांस्कृतिक आवश्यकता

भारतेन्दु का यह युगान्तकारी महत्व है कि उन्होने अपने प्रदेश के सांस्कृतिक आवश्यकताओं को पहचाना; उन्होने हिन्दी के लिये संघर्ष किया; सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में उसका व्यवहार सुदृढ किया।

हिन्दी का विकास हमारे राष्ट्रीय जीवन के लिये आवश्यक और अपरिहार्य था। विशाल हिन्दी प्रदेश का सांस्कृतिक विकास उर्दू के माध्यम से सम्भव न था। सन् 1928 में ख्वाजा हसन निजामी ने कुरान का हिन्दी अनुवाद कराया तो उन्होने भूमिका में बताया कि उत्तर भारत के अधिकांश मुसलमान हिन्दी जानते हैं, उर्दू नहीं। भारतेन्दु ने जो हिन्दी आन्दोलन चलाया वह मुसलमानों के लिये भी उपयोगी था न केवल हिन्दुओं के लिये; ठीक उसी तरह जैसे बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बंगला-सेवा हिन्दू-मुसलमान सबके लिये थी।

हिन्दी आन्दोलन के कारण

  1. हिन्दी क्षेत्र में एक नयी सांस्कृतिक एवं राजनैतिक नवचेतना आयी।
  2. देश के सामने हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में उभरी।
  3. हिन्दी की पत्रकारिता बड़ी तेजी से विकास के रास्ते पर चल पड़ी और देश को आजाद कराने में इसकी अग्रणी भूमिका रही।
  4. भारत में भाषा और लिपि की दृष्टि से एकता आयी।

हिंदी दिवस के उपलक्ष में आइये जानते हैं उन साहित्यकारों के बारे में जिन्होंने हिंदी भाषा को एक अलग रुख दिया, जिनके अथक प्रयास से हिंदी का विकास संभव हो पाया।

1. भारतेन्दु हरिश्चंद्र:

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850-6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम ‘हरिश्चन्द्र’ था, ‘भारतेन्दु’ उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है। उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है।

भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया। भारतेन्दु के वृहत साहित्यिक योगदान के कारण ही 1857 से 1900 तक के काल को भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है।

2. रामचन्द्र शुक्ल:

आचार्य रामचंद्र शुक्ल (4 अक्टूबर, 1884 – 2 फरवरी, 1941) हिन्दी आलोचक, निबन्धकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुवादक, कथाकार और कवि थे। उनके द्वारा लिखी गई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है हिन्दी साहित्य का इतिहास, जिसके द्वारा आज भी काल निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता ली जाती है। हिन्दी में पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात उन्हीं के द्वारा हुआ। हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में भी शुक्ल जी का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

भाव, मनोविकार सम्बंधित मनोविश्लेषणात्मक निबंध उनके प्रमुख हस्ताक्षर हैं। शुक्ल जी ने इतिहास लेखन में रचनाकार के जीवन और पाठ को समान महत्त्व दिया। उन्होंने प्रासंगिकता के दृष्टिकोण से साहित्यिक प्रत्ययों एवं रस आदि की पुनर्व्याख्या की।शुक्ल जी की अनूदित कृतियां कई हैं। ‘शशांक’ उनका बंगला से अनुवादित उपन्यास है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी से विश्वप्रपंच, आदर्श जीवन, मेगस्थनीज का भारतवर्षीय वर्णन, कल्पना का आनन्द आदि रचनाओं का अनुवाद किया।

3. राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द:

राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ (3 फरवरी 1824 – 23 मई 1895) हिन्दी के उन्नायक एवं साहित्यकार थे। वे शिक्षा-विभाग में कार्यरत थे। उनके प्रयत्नों से स्कूलों में हिन्दी को प्रवेश मिला। उस समय हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों का बहुत अभाव था। उन्होंने स्वयं इस दिशा में प्रयत्न किया और दूसरों से भी लिखवाया। आपने ‘बनारस अखबार(1845)’ नामक एक हिन्दी पत्र निकाला और इसके माध्यम से हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया।तथा यह पत्रिका साप्ताहिक थी। इनकी भाषा में फारसी-अरबी के शब्दों का अधिक प्रयोग होता था।

राजा साहब ‘आम फहम और खास पसंद’ भाषा के पक्षपाती और ब्रिटिश शासन के निष्ठावान् सेवक थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इन्हें गुरु मानते हुए भी इसलिए इनका विरोध भी किया था। फिर भी इन्हीं के उद्योग से उस समय परम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शिक्षा विभाग में हिंदी का प्रवेश हो सका। साहित्य, व्याकरण, इतिहास, भूगोल आदि विविध विषयों पर इन्होंने प्राय: 35 पुस्तकों की रचना की जिनमें इनकी ‘सवानेह उमरी’ (आत्मकथा), ‘राजा भोज का सपना’, ‘आलसियों का कोड़ा’, ‘भूगोल हस्तामलक’ और ‘इतिहासतिमिरनाशक’ उल्लेख्य हैं।

इन सभी साहित्यकारों के विशेष योगदान के कारण हिंदी भाषा आज भी अस्तित्व में है। साहित्याकरों के अलावा कुछ ऐसी संस्थाएं भी हैं जिन्होंने हिंदी के प्रचार प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिनमें से कुछ प्रमुख संस्थाओं का विवरण निम्न है:

1. नागरीप्रचारिणी सभा:

नागरीप्रचारिणी सभा, हिन्दी भाषा और साहित्य तथा देवनागरी लिपि की उन्नति तथा प्रचार और प्रसार करनेवाली भारत की अग्रणी संस्था है। भारतेन्दु युग के अनन्तर हिन्दी साहित्य की जो उल्लेखनीय प्रवृत्तियाँ रही हैं उन सबके नियमन, नियंत्रण और संचालन में इस सभा का महत्वपूर्ण योग रहा है।काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना 16 जुलाई, 1893 ई. को श्यामसुन्दर दास जी द्वारा हुई थी। यह वह समय था जब अँगरेजी, उर्दू और फारसी का बोलबाला था तथा हिंदी का प्रयोग करनेवाले बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते थे।

नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना क्वीन्स कालेज, वाराणसी के नवीं कक्षा के तीन छात्रों – बाबू श्यामसुंदर दास, पं॰ रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने कालेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की थी। बाद में 16 जुलाई 1893 को इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने निर्धारित की और आधुनिक हिन्दी के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए। काशी के सप्तसागर मुहल्ले के घुड़साल में इसकी बैठक होती थी। बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना। पहले ही वर्ष जो लोग इसके सदस्य बने उनमें महामहोपाध्याय पं॰ सुधाकर द्विवेदी, जार्ज ग्रियर्सन, अम्बिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे भारत ख्याति के विद्वान् थे।

तत्कालीन परिस्थितियों में सभा को अपनी उद्देश्यपूर्ति के लिए आरम्भ से ही प्रतिकूलताओं के बीच अपना मार्ग निकालना पड़ा। किन्तु तत्कालीन विद्वन्मण्डल और जनसमाज की सहानुभूति तथा सक्रिय सहयोग सभा को आरम्भ से ही मिलने लगा था, अतः अपनी स्थापना के अनन्तर ही सभा ने बड़े ठोस और महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लेना आरम्भ कर दिया।

2. अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन:

अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन, हिन्दी भाषा एवं साहित्य तथा देवनागरी का प्रचार-प्रसार को समर्पित एक प्रमुख सार्वजनिक संस्था है। इसका मुख्यालय प्रयाग (इलाहाबाद) में है जिसमें छापाखाना, पुस्तकालय, संग्रहालय एवं प्रशासनिक भवन हैं। हिंदी साहित्य सम्मेलन ने ही सर्वप्रथम हिंदी लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए उनकी रचनाओं पर पुरस्कारों आदि की योजना चलाई। उसके मंगलाप्रसाद पारितोषिक की हिंदी जगत् में पर्याप्त प्रतिष्ठा है। सम्मेलन द्वारा महिला लेखकों के प्रोत्साहन का भी कार्य हुआ। इसके लिए उसने सेकसरिया महिला पारितोषिक चलाया।

सम्मेलन के द्वारा हिंदी की अनेक उच्च कोटि की पाठ्य एवं साहित्यिक पुस्तकों, पारिभाषिक शब्दकोशों एवं संदर्भग्रंथों का भी प्रकाशन हुआ है जिनकी संख्या डेढ़-दो सौ के करीब है। सम्मेलन के हिंदी संग्रहालय में हिंदी की हस्तलिखित पांडुलिपियों का भी संग्रह है। इतिहास के विद्वान् मेजर वामनदास वसु की बहुमूल्य पुस्तकों का संग्रह भी सम्मेलन के संग्रहालय में है, जिसमें पाँच हजार के करीब दुर्लभ पुस्तकें संगृहीत हैं।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना 1 मई 1910 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा के तत्वावधान में हुआ।

1 मई सन् 1910 को काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी की एक बैठक में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का एक आयोजन करने का निश्चय किया गया। इसी के निश्चयानुसार 10 अक्टूबर 1910 को वाराणसी में ही पण्डित मदनमोहन मालवीय के सभापतित्व में पहला सम्मेलन हुआ। दूसरा सम्मेलन प्रयाग में करने का प्रस्ताव स्वीकार हुआ और सन् 1911 में दूसरा सम्मेलन इलाहाबाद में पण्डित गोविन्दनारायण मिश्र के सभापतित्व में सम्पन्न हुआ। दूसरे सम्मेलन के लिए प्रयाग में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ नाम की जो समिति बनायी गयी, वही एक संस्था के रूप में, प्रयाग में विराजमान है।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन, स्वतन्त्रता-आन्दोलन के समान ही भाषा-आन्दोलन का साक्षी और राष्ट्रीय गर्व-गौरव का प्रतीक है। श्री पुरुषोत्तम दास टंडन सम्मेलन के जन्म से ही मन्त्री रहे और इसके उत्थान के लिए जिये; इसीलिए उन्हें ‘सम्मेलन के प्राण’ के नाम से अभिहित किया जाता है। इस संस्था ने हिन्दी में उच्च कोटि की पुस्तकों (विशेषतः, मानविकी से सम्बन्धित) का सृजन किया। गांधीजी जैसे लोग भी इससे जुड़े। उन्होने सन 1917 में इन्दौर में सम्मेलन की अध्यक्षता की।

हिंदी साहित्य संमेलन अधिनियम, 1962 के द्वारा इसे ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ घोषित किया गया। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से कुछ पत्रिकाओं का भी सम्पादन किया जाता है जिनमें सम्मेलन पत्रिका प्रमुख है।

सम्मेलन पत्रिका (1913) अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका है जो गिरिजाकुमार घोष और रामनरेश त्रिपाठी के संपादकत्व में प्रकाशित हुई। बाद में इसके सम्पादन का भार सम्भाला धीरेन्द्र वर्मा ने। पत्रिका की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसका प्रकाशन आज भी अबाध गति से हो रहा है। यह शोध पत्रिका है। इसका ‘लोक संस्कृति विशेषांक’ बहुत ही चर्चित हुआ। इसके विशेषांकों में कला विशेषांक’, ‘गांधी-टंडन स्मृति विशेषांक’, ‘श्रद्धांजलि विशेषांक’, ‘साहित्य-संस्कृति भाषा विशेषांक’, ‘जन्मशती विशेषांक’ प्रमुख हैं।

हिंदी दिवस को न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर अपितु अंतरास्ट्रीय स्तर पर भी मनाया जाता है, विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Day) को मान्यता 2006 में दी गयी थी।

विश्व हिन्दी दिवस (World Hindi Day)

विश्व हिन्दी दिवस (World Hindi Day) प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। विश्व में हिन्दी का विकास करने और इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था इसीलिए इस दिन को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ (World Hindi Day) के रूप में मनाया जाता है।

विश्व हिन्दी दिवस (World Hindi Day) का उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना, हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना, हिन्दी के लिए वातावरण निर्मित करना, हिन्दी के प्रति अनुराग पैदा करना, हिन्दी की दशा के लिए जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में प्रस्तुत करना है।

विश्व हिन्दी दिवस का इतिहास

भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था।

हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए अनेक साहित्यकारों, पत्रकारों द्वारा विशेष प्रयत्न किये गए परन्तु सिर्फ उन सबका प्रयत्न की काफी नहीं है, ना ही हिंदी को एक विशेष दिन में हिंदी दिवस के रूप में मनाना अनिवार्य है। अगर अनिवार्य है तो यह की हिंदी को हर दिन बोला, सुना और समझा जाये। जहाँ पर अनिवार्य हो सिर्फ वहीँ पर किसी और भाषा का प्रयोग किया जाये, अन्यथा हिंदी भाषा को ही उपयोग में लाया जाये।

जब ऐसा किया जायेगा तभी हिंदी भाषा के लिए किये गए सारे आंदोलन एवं संविधान द्वारा प्रदान की गयी वरीयता सार्थक सिद्ध होगी।भारत के अलावा अनेक देशों में हिंदी भाषा अपने वर्चस्व स्थापित कर रही है, आवश्यकता है तो हिंदी भाषा को वहाँ उसका स्थान देने की जहाँ से इस भाषा का जन्म हुआ है। आशा करते हैं की हम सभी हिंदी भाषा को विलुप्त होने से बचा सकेंगे।

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