Categories: जयंती

विश्वकर्मा पूजा विधि, आरती – विश्वकर्मा पूजा का महत्व

विश्वकर्मा पूजा

विविधताओं से भरे इस भारत देश में शायद ही ऐसा कोई महीना हो जब कोई त्यौहार नहीं मनाया जाता, कभी पूजा तो कभी व्रत, कभी दिवाली तो कभी होली। जीवन को सफल बनाने में जितनी भी आवश्यक सामग्री एवं तत्व हैं उन सभी के लिए हमारे ग्रंथों में किसी न किसी प्रकार कोई देवी या देवता विराजमान है। आज ऐसी ही एक पूजा के बारे में जानते हैं, जिसे विश्वकर्मा पूजा के नाम से जाना जाता है।

विश्वकर्मा पूजा अथवा जयन्ती भारत के ओडिशा,कर्नाटक,बिहार,असम,पश्चिमी बंगाल, झारखण्ड और त्रिपुरा आदि प्रदेशों में हर साल ग्रेगोरियन तिथि अर्थात 17 सितंबर को मनायी जाती है। यह पूजा / जयंती  प्रायः कारखानों एवं औद्योगिक क्षेत्रों में एक बड़े उत्सव के रूप में मनाई जाती है। भगवान् विश्वकर्मा को विश्व का निर्माता एवं देवताओं का वास्तुकार माना गया है और इन्हीं के जन्म दिवस के दिन पूजा का आयोजन भी किया जाता है। यह दिवस हिंदू कैलेंडर की ‘कन्या संक्रांति’ पर पड़ता है।

Vishwakarma Puja 2021 Dates – विश्वकर्मा पूजा 2021:

त्यौहार के नामदिनत्यौहार के तारीख
विश्वकर्मा पूजाशुक्रवार17 सितंबर 2021

क्यों की जाती है कारखानों में पूजा?

यह उत्सव मुख्य रूप से कारखानों और औद्योगिक क्षेत्रों में मनाया जाता है, पूजा हेतु किसी मंदिर को नहीं अपितु औद्योगिक कारखानों के फर्श को पूजा के लिए तैयार किया जाता है। इस उत्सव को न केवल अभियन्ता और वास्तु समुदाय द्वारा बल्कि कारीगरों, शिल्पकारों, यांत्रिकी, स्मिथ, वेल्डर, द्वारा पूजा के दिन को श्रद्धापूर्वक चिह्नित किया गया है। इस दिन सभी अपने उज्जवल एवं बेहतर भविष्य, सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों और सबसे बढ़कर अपने-अपने क्षेत्र में अपार सफलता की पूर्ती के लिए प्रार्थना करते हैं। श्रमिक विभिन्न मशीनों और औद्योगिक औजारों के सुचारू संचालन के लिए प्रार्थना करते हैं, भगवान् विश्वकर्मा के साथ साथ इस दिन औजारों की पूजा भी जाती है।

विश्वकर्मा जयंती (विश्वकर्मा) एक हिंदू भगवान जो एक दिव्य वास्तुकार हैं, के लिए उत्सव का दिन है, उन्हें स्वायंभु और सम्पूर्ण विश्व का निर्माता माना जाता है।वेदों में इस बात का वर्णन है की उन्होंने द्वारका के पवित्र शहर का निर्माण किया जहां भगवान श्री कृष्ण ने शासन किया। पांडवों की माया सभा से लेकर देवताओं के लिए कई शानदार हथियारों का निर्माण भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही किया गया। देवताओं द्वारा उन्हें एक दिव्य बढ़ई भी कहा जाता है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख किया गया है, और इसे यांत्रिकी और वास्तुकला के विज्ञान, स्टैप्टा वेद के साथ श्रेय दिया जाता है। विश्वकर्मा की विशेष प्रतिमाएँ और चित्र सामान्य रूप से भी प्रत्येक कार्यस्थल और कारखानों में स्थापित की जाती हैं।सभी कार्यकर्ता एक विशेष जगह पर इकट्ठा होते हैं और भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते हैं। विश्वकर्मा पूजा के तीसरे दिन हर्षोल्लास के साथ भगवान् विश्वकर्मा जी की प्रतिमा को विसर्जित करने का चलन है।

विश्वकर्मा जयंती (Vishwakarma Jayanti) को पूर्ण रूप से जानने के लिए यह भी जानना आवश्यक है की भगवान् विश्वकर्मा कौन थे और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई? हिन्दू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। पारम्परिक ग्रंथों के अनुसार भगवान् शिव के लिए सोने की लंका का निर्माण उन्होंने ही किया था, जिसे भगवान् शिव द्वारा रावण को बाद में उपहार स्वरुप दे दिए गया था।

भगवान् विश्वकर्मा का जन्म:

हिन्दू ग्रन्थ ऋग्वेद के अनुसार “महर्षि अंगिरा” के ज्येष्ठ पुत्र “बृहस्पति “की बहन भुवना जो ब्रह्मविद्या जानने वाली थी, वह अष्टम् वसु महर्षि प्रभास से विवाह कर उनकी पत्नी बनी और उनसे सम्पूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता “प्रजापति भगवान् विश्वकर्मा” का जन्म हुआ। हिन्दू पुराणों में इसका वर्णन कहीं योगसिद्धा तो कहीं वरस्त्री के रूप में किया गया है। शिल्प शास्त्र के कर्ता भगवान् विश्वकर्मा देवताओं के आचार्य हैं, सम्पूर्ण सिद्धियों के जनक हैं। वह प्रभास ऋषि के पुत्र हैं और महर्षि अंगिरा के दौहितृ हैं अर्थात अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र के भांजे हैं। भगवान् विश्वकर्मा और अंगिरा कुल का सम्बन्ध तो सभी विद्वानो द्वारा स्वीकृत है। जिस प्रकार  हिन्दू धर्म ग्रंथों में ईश विश्वकर्मा को शिल्पशास्त्र का अविष्कार करने वाला देवता माना जाता हे और सभी कारीगर, औद्योगिकी उनकी पूजा करते हैं ठीक उसी प्रकार चीन में लु पान को शिल्पशास्त्र का देवता माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थों के मनन से यह विदित होता है कि जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश की वन्दना-अर्चना हुई है वहीँ भगवान् विश्वकर्मा को भी स्मरण-परिष्टवन किया गया है। जैसा हम देख भी सकते हैं की “विश्वकर्मा” शब्द से ही यह अर्थ-व्यंजित होता है।

भारतीय संस्कृति के तहत भी शिल्प संकायो, कारखानो, उद्योगों में ईश विश्वकर्मा की महत्वता को प्रकट करते हुए प्रत्येक वर्ष 17 सितम्बर को श्वम दिवस के रूप मे मनाता हे। यह उत्पादन-वृद्धि की ओर राष्टीय समृद्धि के लिए एक संकलप दिवस के रूप में जाना जाता है। यह दिवस अपने आप में जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान के नारे के संकल्प को समाहित किये हुऐ है।

यह महोत्सव सोरवर्ष के कन्या संक्रांति में प्रत्येक वर्ष 17 सितम्बर विश्वकर्मा पूजा के रूप मे सरकारी व गैर सरकारी औद्योगिक संस्थानो मे बडे ही हर्षोल्लाष से सम्पन्न होता है।

भारत में आन्ध्रप्रदेश के मछलीपट्टनम विश्वकर्मा मन्दिर में भगवान विश्वकर्मा जी की वर्ष में कई बार पूजा की जाती है और एक बड़ा महोत्सव मनाया जाता है।भाद्रपद शुक्ला प्रतिपदा इस तिंथि की महिमा का पूर्ण विवरण महाभारत में विशेष रूप से मिलता है। यह पर्व शिलांग और पूर्वी बंगाल में मुख्य तौर पर मनाया जाता है। अन्नकुट (गोवर्धन पूजा) दिपावली से अगले दिन भगवान विश्वकर्मा जी की पूजाअर्चना औजारों की पूजा अर्चना के रूप में भी की जाती है। 5 मई को ऋषि अंगिरा के जन्म का दिन माना जाता है और ऋषि अंगिरा जयन्ति होने से विश्वकर्मा पूजा महोत्सव मनाया जाता है। भगवान विश्वकर्मा जी की जन्म तिथि माघ मास त्रयोदशी शुक्ल पक्ष दिन रविवार का ही साक्षत रूप से सुर्य की ज्योति है।प्राचीन ग्रंथों के अनुसार ब्राहाण हेली को यजो से प्रस्सन हो कर माघ मास मे साक्षात रूप में भगवान विश्वकर्मा ने दर्शन दिये थे। श्री विश्वकर्मा जी का वर्णन मदरहने वृध्द वशीष्ट पुराण मे भी है।

धर्मशास्त्र भी माघ शुक्ल त्रयोदशी को ही विश्वकर्मा जयंती के लिए सही दिवस बता रहे है। अतः अन्य दिवस भगवान विश्वकर्मा जी की पुजा-अर्चना व महोत्सव दिवस के रूप मे मनाऐ जाते है। ठीक इसी प्रकार भगवान विश्वकर्मा जी की जयन्ती पर भी विद्वानों में मतभेद है। भगवान विश्वकर्मा जी का वर्ष में कई बार पूजन अर्चन किया जाता है और महोत्सव मनाया जाता है (अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार)।

निःसंदेह ही यह विषय निर्भ्रम नहीं है। हम स्वीकार करते है प्रभास पुत्र विश्वकर्मा, भुवन पुत्र विश्वकर्मा तथा त्वष्ठापुत्र विश्वकर्मा आदि अनेकों विश्वकर्मा हुए हैं।

स्पष्ट है कि विश्वकर्मा पूजा जन कल्याणकारी है। अतः प्रत्येक प्राणी सृष्टिकर्ता, शिल्प कलाधिपति, तकनीकी ओर विज्ञान के जनक भगवान विशवकर्मा जी की पुजा-अर्चना अपनी व राष्टीय उन्नति के लिए अवश्य करनी चाहिए।

हिन्दू धर्म मान्यतों के अनुसार चार युगों में भगवान विश्वकर्मा ने कई नगरों और भवनों का निर्माण किया है। समयानुसार सबसे पहले सतयुग में उन्होंने स्वर्गलोक का निर्माण किया, त्रेता युग में लंका का, द्वापर में द्वारका का और कलियुग के आरम्भ के 50 वर्ष पूर्व हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया। यह भी मान्यता है की विश्वकर्मा ने ही जगन्नाथ पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में स्थित विशाल मूर्तियों (कृष्ण, सुभद्रा और बलराम) का निर्माण किया है।

विश्वकर्मा पूजा के दिन ध्यान रखने योग्य बातें:

आइये जानते हैं कि विश्वकर्मा पूजा के दिन किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए-

  • पूजा में औजारों का उपयोग: पूजन दिवस के दिन यदि आप विश्वकर्मा भगवान की प्रतिमा अथवा चित्र रखकर उनकी पूजा कर रहे हैं तो अपने औजारों को पूजा में रखना न भूलें, याद रहे विश्वकर्मा औजारों के पूजन से ही प्रसन्न होते हैं साथ ही साथ विश्वकर्मा पूजा के दिन किसी भी पुराने औजार को अपने घर, फैक्ट्री या दुकान से बाहर न फेंके, ऐसा करना विश्वकर्मा जी का अपमान जाता है।
  • औद्योगिक स्थल पर पूजा का आयोजन: पूजा का आयोजन औद्योगिक स्थल जैसे कारखाने, फैक्ट्री में ही किया जाना चाहिए।
  • मशीन से जुड़ा कोई कार्य न करें: जिन लोगों के भी कारखाने, फैक्ट्रीयां आदि है या फिर उनका मशीन से जुड़ा कोई काम है तो उन्हें विश्वकर्मा पूजा के दिन अपनी मशीनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • वाहन की सफाई: यदि आपके पास कोई वाहन है तो विश्वकर्मा पूजा के दिन उसकी साफ सफाई और पूजा करना न भूलें।
  • मांस मदिरा का सेवन वर्जित: विश्वकर्मा पूजा के दिन भूलकर भी मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • दान: अपने व्यापार की वृद्धि के लिए आपको विश्वकर्मा पूजा के दिन निर्धन व्यक्ति और ब्राह्मण को दान अवश्य देना चाहिए।

विश्वकर्मा पूजा विधि:

इस दिन पूजा करने हेतु दो प्रकार की विधियों का वर्णन मिलता है, पूजन विधि से पहले विश्वकर्मा के पूजन मंत्र एवं आरती को जान लेते हैं :

पूजन मंत्र: ” ॐ आधार शक्तपे नम: और ॐ कूमयि नम:।

ॐ अनन्तम नम:, ॐ पृथिव्यै नम:।।”

विश्वकर्मा पूजा आरती:

जहाँ मंत्र जाप 108 बार किया जाता है , वहीँ प्रसाद वितरण एवं मंत्र जाप से पहले आरती का विधान है:

” हम सब उतारे आरती तुम्हारी हे विश्वकर्मा, हे विश्वकर्मा।

युग–युग से हम हैं तेरे पुजारी, हे विश्वकर्मा।।

मूढ़ अज्ञानी नादान हम हैं, पूजा विधि से अनजान हम हैं।

भक्ति का चाहते वरदान हम हैं, हे विश्वकर्मा।।

निर्बल हैं तुझसे बल मांगते, करुणा का प्यास से जल मांगते हैं।

श्रद्धा का प्रभु जी फल मांगते हैं, हे विश्वकर्मा।।

चरणों से हमको लगाए ही रखना, छाया में अपने छुपाए ही रखना।

धर्म का योगी बनाए ही रखना, हे विश्वकर्मा।।

सृष्टि में तेरा है राज बाबा, भक्तों की रखना तुम लाज बाबा।

धरना किसी का न मोहताज बाबा, हे विश्वकर्मा।।

धन, वैभव, सुख–शान्ति देना, भय, जन–जंजाल से मुक्ति देना।

संकट से लड़ने की शक्ति देना, हे विश्वकर्मा।।

तुम विश्वपालक, तुम विश्वकर्ता, तुम विश्वव्यापक, तुम कष्टहर्ता।

तुम ज्ञानदानी भण्डार भर्ता, हे विश्वकर्मा।।

विधि 1:

विश्वकर्मा दिवस के सुबह उठकर स्नानादि कर पवित्र हो जाएं, फिर पूजन स्थल को साफ करें (पूजन स्थल जमीन के संपर्क में होना चाहिए) एवं गंगा-जल छिड़क कर पूजन स्थान को भी पवित्र करें। एक साफ़ चौकी लेकर उस पर पीले रंग का कपड़ा बिछाएं। पीले कपड़े पर लाल रंग के कुमकुम से स्वास्तिक चिह्न बनाएं। भगवान श्री गणेश का ध्यान करते हुए उन्हें प्रणाम करें। इसके बाद स्वास्तिक पर चावल और फूल अर्पित करें, फिर उस चौकी पर भगवान विष्णु (सृष्टि सृजन कर्ता) और भगवान् श्री विश्वकर्मा जी की प्रतिमा या चित्र लगाएं । एक दीपक जलाकर चौकी पर रखें, भगवान विष्णु और ऋषि विश्वकर्मा जी के मस्तक पर तिलक लगाकर पूजा का शुभारम्भ करें। भगवान् विश्वकर्मा जी और विष्णु जी को प्रणाम करते हुए उनका मन ही मन स्मरण करें। साथ ही यह प्रार्थना करें कि वह आपकी नौकरी-व्यापार में तरक्की के सभी मार्ग आपको दिखलायें। विश्वकर्मा जी के मंत्र का १०८ बार जप करने का विधान है, फिर श्रद्धा भाव से भगवान विष्णु की आरती करने के बाद विश्वकर्मा जी की आरती करें। आरती के बाद उन्हें फल-मिठाई आदि का भोग लगाएं, इस भोग को सभी लोगों और कर्मचारियों में जरूर बांटें।

विधि 2:

भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने के लिए सुबह स्नान आदि करने के बाद अच्छे एवं साफ कपड़े पहनें और भगवान विश्वकर्मा की पूजा (Vishwakarma Puja) प्रारम्भ करें। पूजा के समय अक्षत, हल्दी, फूल, पान का पत्ता, लौंग, सुपारी, मिठाई, फल, धूप, दीप और रक्षासूत्र जरूर रखें। आप जिन औजारों की पूजा करना चाहते हैं उन पर हल्दी और चावल लगाएं, साथ ही साथ धूप और अगरबत्ती भी जलाए। इसके बाद आटे की रंगोली बनाकर उस रंगोली पर ७ तरह के अनाज रखें। तत्पश्चात एक लोटे में जल भरकर रंगोली पर रखें, उसके बाद भगवान श्री विष्णु और विश्वकर्मा जी की आरती करें। आरती के बाद विश्वकर्मा जी एवं श्री विष्णु जी को भोग लगाकर सभी को प्रसाद बांटें। इसके बाद कलश को हल्दी और चावल के साथ रक्षासूत्र चढ़ाएं, इसके पश्चात पूजा करते वक्त मंत्रों का उच्चारण करें, मन्त्रों का उच्चारण 108 बार करना शुभ माना जाता है। जब पूजा खत्म हो जाए उसके बाद सभी लोगों में प्रसाद का वितरण करें।

इस दिन दफ्तर के साथ ही घर में भी सभी मशीनों की पूजा करने का विधान है, बिजली के उपकरण, किचेन के उपकरण हो या फिर बाहर खड़ी गाड़ी, Vishwakarma Puja (विश्वकर्मा पूजा) के दिन सभी की सफाई कर पूजा अर्चना करें।ऑयलिंग और ग्रीसिंग कर उपकरणों की पूजा करें जिससे सभी उपकरण सही अवस्था में रहेंगे। पूजन दिवस के दिन इनकी देखभाल किसी मशीन की तरह न करके, इस प्रकार करें जिससे ऐसा प्रतीत हो कि आप भगवान विश्वकर्मा की ही पूजा कर रहे हों। विधि के रूप में देखा जाए तो आप दोनों ही विधियों का पालन घर में सुचारु रूप से कर सकते हैं।

विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Vishwakarma Puja Significance):

भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि प्राचीन ग्रंथों के अनुसार उन्हें पहला वास्तुकार माना गया है। मान्यता है कि हर साल अगर आप घर में रखे हुए लोहे और मशीनों की पूजा करते हैं तो वो जल्दी खराब नहीं होते हैं।साथ ही साथ कारोबार में विस्तार होता है। मशीनें अच्छी चलती हैं क्योंकि भगवान उन पर अपनी कृपा बनाकर रखते हैं। इस इन पूजन करने से व्यापार में वृद्धि होती है। भारत के कई हिस्सों में हिस्से में बेहद धूम धाम से मनाया जाता है।

यह भी देखें 👉👉 हिंदी दिवस कब मनाया जाता है? World Hindi Day, History

admin

Recent Posts

Current Affairs December 2020 in Hindi – करंट अफेयर्स दिसंबर 2020

Current Affairs December 2020 in Hindi – करंट अफेयर्स दिसंबर 2020 Current Affairs December 2020 in Hindi – दिसंबर 2020… Read More

51 years ago

एकादशी व्रत 2021 तिथियां – Ekadashi 2021 Date – एकादशी व्रत का महत्व

एकादशी का हिंदू धर्म में एक विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में व्रत एवं उपवास को धार्मिक दृष्टि से एक… Read More

51 years ago

मोक्षदा एकादशी पूजा विधि, व्रत कथा

मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी को वैकुण्ठ एकादशी… Read More

51 years ago

उत्पन्ना एकादशी पूजा विधि, व्रत कथा

उत्पन्ना एकादशी मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहते हैं। इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी भी कहा… Read More

51 years ago

देवउठनी एकादशी या देवुत्थान एकादशी पूजा विधि, व्रत कथा

देवउठनी एकादशी या देवुत्थान एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी या देवुत्थान एकादशी कहा जाता… Read More

51 years ago

रमा एकादशी पूजा विधि, व्रत कथा

रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से… Read More

51 years ago

For any queries mail us at admin@meragk.in