ताजमहल – Taj Mahal – हिंदुओ के अनुसार ताजमहल एक शिव मंदिर है “तेजोमहालय“

ताजमहल – Taj Mahal

ताजमहल (Taj Mahal) को विश्वभर में प्रेम की धरोहर के रूप में जाना जाता है। आगरा में यमुना नदी के दक्षिण तट पर एक हाथीदांत-सफेद संगमरमर का मकबरा है। इसे 1632 में मुगल सम्राट शाहजहां (जिसने1628 से 1658 तक शासन किया) द्वारा अपनी पसंदीदा पत्नी मुमताज महल की मकबरे के लिए शुरू किया गया था। ताजमहल (Taj Mahal) दिखने में जितना ख़ूबसूरत है उसकी रचना उतनी ही आश्चर्य करने वाली है। ताजमहल को भारत की इस्लामी कला का रत्न भी घोषित किया गया है।

वर्ष 2000 में स्विस फाउंडेशन ने सात नए अजूबों को चुनने के लिए  नई 7 वंडर्स  के नाम से  अभियान शुरू किया, जिसमें दुनिया भर से आये हुए वोट्स के माध्यम से 2007 में 7 अजूबों को  विजेता के रूप में चुना गया।

1999 में पहली बार सात अजूबों को चुनने की शुरुआत की गयी। यह पहल स्विट्ज़रलैंड से शुरू हुयी और इसके लिए एक फाउंडेशन बनाया गया। इस फाउंडेशन ने एक नई साईट बनवाई, जिसमें विश्व की 200 धरोहरों की एक लिस्ट बनाई गई। इसके बाद विश्वभर की जनता से वोटिंग करने का अनुरोध किया गया। विश्वभर से आयी वोटिंग्स के आधार पर इन नए सात अजूबों की घोषणा 7 जुलाई 2007 को लिस्बन, पुर्तगाल में Canadian-Swiss Bernard Weber के नेतृत्व में एक सर्वेक्षण के बाद की गई थी और जिसे न्यू 7 वंडर्स फाउंडेशन द्वारा ज्यूरिख, स्विट्जरलैंड में आयोजित की गई। दुनिया भर में संगठन द्वारा पोल में इंटरनेट के माध्यम से या टेलीफोन द्वारा 100 मिलियन वोट डाले गए।

विश्वभर से आये वोट्स के आधार पर जिन 7 वंडर्स को चुना था, वो कुछ इस प्रकार थे:

1. रोमन कोलॉज़िअम – रोम, इटली।

2. माचू पिच्चु  – कुज़्को रीजन, पेरू।

3. पेट्रा – मान, जॉर्डन।

4. ताजमहल – आगरा, इंडिया।

5. क्राइस्ट द रिडीमर की प्रतिमा – रिओ दे गेनेरिओ, ब्राज़ील।

6. चीन की महान दीवार – चीन।

7. चिचेन इत्ज़ा में पिरामिड – यूकाटन, मेक्सिको।

विश्व के ये सभी 7 धरोहर अपने आप में बहुत ही ख़ूबसूरत और आश्चर्यचकित करने वाली हैं। इनकी खूबसूरती की जितनी बात की जाये कम है, आज इन्हीं 7 आश्चर्यों में से एक “ताजमहल” के बारे में जानते हैं।

रचना:

साधारणतया देखे गये संगमर्मर की सिल्लियों की बडी- बडी पर्तो से  बनाई गई इमारतों की तरह न बनाकर इसका श्वेत गुम्बद एवं टाइल आकार में संगमर्मर से ढका है। केन्द्र में बना मकबरा अपनी वास्तु श्रेष्ठता में सौन्दर्य के संयोजन का परिचय देते हैं। ताजमहल (Taj Mahal) इमारत समूह की संरचना की खास बात है, कि यह पूर्णतया सममितीय है।

इस इमारत के ऊपर एक वृहत गुम्बद सुशोभित है।अधिकतर मुग़ल मक़बरों जैसे, इसके मूल अवयव फ़ारसी उद्गम से हैं।मुख्य मेहराब के दोनों ओर,एक के ऊपर दूसरा शैलीमें, दोनों ओर दो-दो अतिरिक्त पिश्ताक़ बने हैं। इसी शैली में, कक्ष के चारों किनारों पर दो-दो पिश्ताक (एक के ऊपर दूसरा) बने हैं।मकबरे के चारों ओर चार मीनारें मूल आधार चौकी के चारों कोनों में, इमारत के दृश्य को एक चौखटे में बांधती प्रतीत होती हैं। मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं। ये खूब अलंकृत हैं, एवं इनकी असल निचले तल पर स्थित है।

मकबरे पर सर्वोच्च शोभायमान संगमर्मर का गुम्बद, इसकी ऊँचाई लगभग इमारत के आधार के बराबर, 35 मीटर है और यह एक 7 मीटर ऊँचे बेलनाकार आधार पर स्थित है।  इसका शिखर एक उलटे रखे कमल से अलंकृत है। यह गुम्बद के किनारों को शिखर पर सम्मिलन देता है।

गुम्बद के आकार को इसके चार किनारों पर स्थित चार छोटी गुम्बदाकारी छतरियों से और बल मिलता है। छतरियों के गुम्बद, मुख्य गुम्बद के आकार के सामान ही हैं। इनके स्तम्भाकार आधार, छत पर आंतरिक प्रकाश की व्यवस्था हेतु खुले हैं। संगमर्मर के ऊँचे सुसज्जित गुलदस्ते, गुम्बद की ऊँचाई को शोभायमान करते हैं, साथ ही छतरियों एवं गुलदस्तों पर भी कमलाकार शिखर शोभा देता है। गुम्बद एवं छतरियों के शिखर पर परंपरागत फारसी एवं हिंदू वास्तु कला का प्रसिद्ध घटक एक धात्विक कलश किरीटरूप में शोभायमान है।

ताजमहल (Taj Mahal) का बाहरी अलंकरण, मुगल वास्तुकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। जैसे ही सतह का क्षेत्रफल बदलता है, बडे़ पिश्ताक का क्षेत्र छोटे से अधिक होता है और उसका अलंकरण भी इसी अनुपात में बदलता है। अलंकरण घटक रोगन या गचकारी से अथवा नक्काशी एवं रत्न जड़ कर निर्मित हैं।अलंकरण को केवल सुलेखन, निराकार, ज्यामितीय या पादप रूपांकन से ही किया गया है।

ताजमहल (Taj Mahal) में पाई जाने वाले सुलेखन फ्लोरिड थुलुठ लिपि के हैं।यह सुलेख जैस्प‍र को श्वेत संगमर्मर के फलकों में जड़ कर किया गया है। संगमर्मर के सेनोटैफ पर किया गया कार्य अतीव नाजु़क  एवं महीन है, ऊँचाई का भी भरपूर ध्यान रखा गया है जिसकी वजह से इसका आकार और भी सुन्दर लगता है। ऊँचे फलकों पर उसी अनुपात में बडा़ लेखन किया गया है, जिससे कि नीचे से देखने पर टेढा़पन ना प्रतीत हो। पूरे क्षेत्र में कु़रान की आयतों का प्रयोग अलंकरण के लिए किया गया है।शोधों से ज्ञात हुआ है कि अमानत खाँ ने ही उन आयतों का चुनाव भी किया था।

बलुआ-पत्थर की इमारत के गुम्बदों एवं तहखानों में, पत्थर की नक्काशी से उत्कीर्ण चित्रकारी द्वारा विस्तृत ज्यामितीय नमूने बना अमूर्त प्रारूप उकेरे गए हैं। यहां हैरिंगबोन शैली में पत्थर जड़ कर संयुक्त हुए घटकों के बीच का स्थान भरा गया है। लाल बलुआ-पत्थर इमारत में श्वेत, एवं श्वेत संगमर्मर में काले या गहरे, जडा़ऊ कार्य किए हुए हैं। संगमर्मर इमारत के गारे-चूने से बने भागों को रंगीन या गहरा रंग किया गया है। इसमें अत्यधिक जटिल ज्यामितीय प्रतिरूप बनाए गए हैं। फर्श एवं गलियारे में विरोधी रंग की टाइलों या गुटकों को टैसेलेशन नमूने में प्रयोग किया गया है। मकबरे की निचली दीवारों पर भी कला का अनोखा उदाहरण देखने को मिलता है। यह श्वेत संगमर्मर के नमूने हैं, जिनमें सजीव बास रिलीफ शैली में पुष्पों एवं बेल-बूटों का सजीव अलंकरण किया गया है।डैडो साँचे एवं मेहराबों के स्पैन्ड्रल भी पीट्रा ड्यूरा के उच्चस्तरीय रूपांकित हैं। इन्हें लगभग ज्यामितीय बेलों, पुष्पों एवं फलों से सुसज्जित किया गया है। इनमें जडे़ हुए पत्थर हैं – पीत संगमर्मर, जैस्पर, हरिताश्म, जिन्हें भीत-सतह से मिला कर घिसाई की गई है।

1800 ई. में ताजमहल (Taj Mahal) के शिखर गुंबद पर स्थित कलश सोने का बना हुआ था, परंतु अब इसे कांसे के द्वारा निर्मित किया गया है। इस कलश पर चंद्रमा की आकृति है, जिसकी ऊपरी आकृति स्वर्ग की ओर इशारा करती है. चंद्रमा की आकृति तथा कलश की नोंक मिल कर त्रिशूल का आकार बनाती है, यह त्रिशूल हिन्दू मान्यता के भगवान शिव का चिन्ह को दर्शाता है।

ताजमहल (Taj Mahal) के चारों कोनों पर 40 मीटर ऊंची चार मीनारें हैं। इन चारों मीनारों का निर्माण कुछ इस तरह किया गया है कि यह चारों मीनार हल्की सी बाहर की तरफ झुकी हुई हैं। इनका बाहर की तरफ झुकाव के पीछे यह तर्क रखा गया कि, इमारत के गिरने की स्थिति में यह मीनारें बाहर की तरफ ही गिरे, जिससे की मुख्य ताजमहल की इमारत को कोई नुकसान न पहुंचे।

दुनिया के 7 अजूबों में से एक ताजमहल (Taj Mahal) की सुंदर नक्काशी और कारीगरी की वजह से यह अपने आप में अद्धितीय है,लेकिन इसकी खूबसूरती को इसके परिसर में बने हरे-भरे बगीचे और भी ज्यादा बढ़ा रहे हैं।यहां चार सुंदर बगीचे बने हुए हैं, जो कि इसके दोनों तरफ फैले हुए हैं। वहीं यहां आने वाले सैलानी ताजमहल की खूबसूरती को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, और इस पल को हमेशा के लिए संजोने के लिए एवं इसे और ज्यादा खास बनाने के लिए तस्वीरें भी लेते हैं।

ताजमहल (Taj Mahal) के पूरा होने के तुरंत बाद ही, शाहजहाँ को अपने पुत्र औरंगजे़ब द्वारा अपदस्थ कर, आगरा के किले में नज़रबन्द कर दिया गया था। शाहजहाँ की मृत्यु के बाद, उन्हें उनकी पत्नी के बराबर में दफना दिया गया था। अंतिम 19वीं सदी होते होते ताजमहल (Taj Mahal) की हालत काफी जीर्ण-शीर्ण हो चली थी। अंग्रेजों ने अपने शासन काल में ताजमहल (Taj Mahal) को पुनः उसकी वास्तविक स्थिति में लाने का प्रयास किया और कई वर्षों के पश्चात वे ऐसा करने में सफल भी हुए।

यही पर्यटन की दृष्टि से देखा जाए तो ताजमहल (Taj Mahal) प्रत्येक वर्ष 20 से 40 लाख दर्शकों को आकर्षित करता है, जिसमें से 200,000 से अधिक विदेशी पर्यटक होते हैं। अधिकतर पर्यटक यहाँ अक्टूबर, नवंबर एवं फरवरी के महीनों में आते हैं। इस स्मारक के आसपास प्रदूषण फैलाते वाहन प्रतिबन्धित हैं। पर्यटक पार्किंग से या तो पैदल जा सकते हैं, या विद्युत चालित बस सेवा द्वारा भी जा सकते हैं।

ताजमहल के सम्बन्ध में अनेकों प्रकार के तथ्य प्रचलति हैं, जिनमें से आइये कुछ मुख्य तथ्यों के बारे में जानते हैं:

1. ऐसा माना जाता है, कि शाहजहाँ ने उन कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे, जिन्होंने ताजमहल (Taj Mahal) का निर्माण किया था। परंतु इसके पूर्ण साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। कुछ लोगों का कहना है, कि ताजमहल (Taj Mahal) के निर्माण से जुडे़ लोगों से यह करारनामा लिखवा लिया गया था, कि वे ऐसे रूप का कोई भी दूसरी इमारत नहीं बनाएंगे।

2. एक पुरानी कथा के अनुसार, शाहजहाँ की इच्छा थी कि यमुना के उस पार भी एक ठीक ऐसा ही, किंतु काला ताजमहल निर्माण हो जिसमें उनकी कब्र बने। यह अनुमान जीन बैप्टिस्ट टैवर्नियर, प्रथम यूरोपियन ताजमहल पर्यटक, जिसने आगरा 1665 में घूमा था, के द्वारा दी गयी जानकारी के आधार पर है। उसमें बताया है, कि शाहजहाँ को अपदस्थ कर दिया गया था, इससे पहले कि वह काला ताजमहल बनवा पाए। काले पडे़ संगमर्मर की शिलाओं से, जो कि यमुना के उस पार, माहताब बाग में हैं; इस तथ्य को बल मिलता है। परंतु, 1990 के दशक में की गईं खुदाई से पता चला, कि यह श्वेत संगमर्मर ही थे, जो कि काले पड़ गए थे।

3. मुगलकाल में बनी ताजमहल की इमारत इकलौती ऐसी इमारत है, जिसका निर्माण सफेद संगमरमर के पत्थरो्ं से किया गया है। इस भव्य स्मारक के निर्माण में करीब 23 साल का लंबा वक्त लगा था, जिसे न सिर्फ भारतीय मजदूर बल्कि तुर्की और फारस के मजदूरों ने भी बनाया था।

4. आगरा में स्थित ताजमहल एक ऐसी लकड़ी के आधार पर बनाया गया है, जिसे मजबूत बनाए रखने के लिए नमी की जरूरत होती है, और इस नमी को यमुना नदी बनाकर रखती है।

5. दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक ताजमहल जाने वाले मुख्य मार्ग के बीच जो फव्वारे लगाए गए हैं, वे किसी पाइप से नहीं जुड़े हैं, बल्कि हर फव्वारे के नीचे एक तांबे का टैंक है, यह सभी टैंक एक ही समय पर भरते हैं, और प्रेशर पड़ने पर इसमें पानी भी छोड़ते हैं।

6. ताजमहल को बनाने के लिए करीब 8 अलग-अलग देशों से सामान लाया गया था। और इसकी निर्माण सामग्री ढोने के लिए करीब 1500 हाथियों का सहारा लिया गया था।

7. हिंदुओ के अनुसार ताजमहल एक शिव मंदिर है जिसका असली नाम है “तेजोमहालय“. क्योकिं किसी भी मुस्लिम देश में ऐसी कोई इमारत नही है जिसके नाम में महल आए. ‘महल’ मुस्लिम शब्द नही हैं. ऐसी ही और भी कई बातें हैं.

ताजमहल के लेख:

ताजमहल में प्रवेश करते ही आपको भिन्न भिन्न प्रकार के लेख एवं कलाकृति दीवाओं पर देखने को मिलेंगी। इसके द्वार पर बहुत ही सुंदर सुलेख है, “हे आत्मा ! तू ईश्वर के पास विश्राम कर, ईश्वर के पास शांति के साथ रहे तथा उसकी पूर्ण शांति तुझ पर बरसे.”

  • इन लेख का श्रेय फारसी लिपिक अमानत खां को जाता है।
  • यह लेख जेस्पर को सफ़ेद संगमरमर के फलकों में जड़ कर लिखा गया है।
  • ताजमहल में लिखे लेख में कई सूरा वर्णित है. यह सूरा कुरान में मौजूद है। इस सूरा में कुरान की कई आयतें मौजूद है।

इसके अलावा भी बहुत से लेख दीवारों पर लिखे गए हैं, परन्तु इन लेखों को समझने अथवा पढ़ने के लिए ताजमहल की दीवारों को बहुत बारीकी से देखना पड़ता है।

ताजमहल क्यों और किसके लिए बनवाया गया था?

खुर्रम उर्फ शाहजहां ने 1612 ईसवी में अरजुमंद बानो बेगम से उनकी खूबसूरती से प्रेरित होकर निकाह किया था। जिसके बाद वे उनकी सबसे प्रिय बेगम बन गईं थी। मुगल बादशाह शाहजहां अपनी बेगम मुमताज महल को इस कदर प्रेम करता था कि वह एक पल भी उनसे दूर नहीं रह सकता था, यहां तक की वह अपने राजनैतिक दौरे में भी उनको अपने साथ लेकर जाता था और मुमताज बेगम की सलाह से ही अपने राज-काज से जुड़े सभी फैसले लेता था और मुमताज की मुहर लगने के बाद ही शाही फरमान जारी करता था।वहीं 1631 ईसवी में मुमताज महल जब अपनी 14वीं संतान को जन्म दे रही थीं, तभी अत्याधिक प्रसव पीड़ा की वजह से उनकी मौत हो गई थी।वहीं शाहजहां अपने प्रिय बेगम की मौत से अंदर से बिल्कुल टूट गया था, और इसके बाद वह काफी गमगीन रहने लगा था, फिर उसने अपने प्रेम को सदा अमर रखने के लिए ”मुमताज का मकबरा” बनाने का फैसला लिया था,जिसे आज ताजमहल के नाम से जाना जाता है।

निर्माण कार्य:

ताजमहल परिसीमित आगरा नगर के दक्षिण छोर पर एक छोटे भूमि पठार पर बनाया गया था। पूर्व में इस जमीन पर राजपुताना राज्य अंतर्गत जयपूर के महाराजा जयसिंह का आलीशान महल था। महाराजा शाहजहाँ ने इसके बदले जयपुर के महाराजा जयसिंह को आगरा शहर के मध्य एक वृहत महल दिया था। लगभग तीन एकड़ के क्षेत्र को खोदा गया, एवं उसमें कूडा़ भर कर उसे नदी सतह से पचास मीटर ऊँचा बनाया गया, जिससे कि सीलन से बचाव हो पाए। मकबरे के क्षेत्र में, पचास कुँए खोद कर कंकड़-पत्थरों से भरकर नींव स्थान बनाया गया। फिर एक बहुत बडा़ ईंटों का, मकबरे समान ही ढाँचा बनाया गया। यह ढाँचा इतना बडा़ था, कि अभियाँत्रिकों के अनुमान से उसे हटाने में ही सालों लग जाते।

इसका समाधान यह हुआ, कि शाहजाहाँ के आदेशानुसार स्थानीय किसानों को खुली छूट दी गई कि एक दिन में कोई भी चाहे जितनी ईंटें उठा सकता है और वह ढाँचा रात भर में ही साफ हो गया। सारी निर्माण सामग्री एवं संगमर्मर को नियत स्थान पर पहुँचाने हेतु, एक पंद्रह किलोमीटर लम्बा मिट्टी का ढाल बनाया गया। बीस से तीस बैलों को खास निर्मित गाडि़यों में जोतकर शिलाखण्डों को यहाँ लाया गया था। एक विस्तृत पैड़ एवं बल्ली से बनी, चरखी चलाने की प्रणाली बनाई गई, जिससे कि खण्डों को इच्छित स्थानों पर पहुँचाया गया। नदी से पानी लाने हेतु रहट प्रणाली का प्रयोग किया गया था। उससे पानी ऊपर बने बडे़ टैंक में भरा जाता था। फिर यह तीन गौण टैंकों में भरा जाता था, जहाँ से यह नलियों द्वारा स्थानों पर पहुँचाया जाता था।

आधारशिला एवं मकबरे को निर्मित होने में बारह साल लगे। शेष इमारतों एवं भागों को अगले दस वर्षों में पूर्ण किया गया। इनमें पहले मीनारें, फिर मस्जिद, फिर जवाब एवं अंत में मुख्य द्वार बने। क्योंकि यह समूह, कई अवस्थाओं में बना, इसलिये इसकी निर्माण-समाप्ति तिथि में कई भिन्नताएं हैं। यह इसलिये है, क्योंकि पूर्णता के कई पृथक मत हैं। उदाहरणतः मुख्य मकबरा 1643 में पूर्ण हुआ था, किंतु शेष समूह इमारतें बनती रहीं। इसी प्रकार इसकी निर्माण कीमत में भी भिन्नताएं हैं, क्योंकि इसकी कीमत तय करने में समय के अंतराल से काफी फर्क आ गया है।

फिर भी कुल मूल्य लगभग 3 अरब 20 करोड़ रुपए, उस समयानुसार आंका गया है; जो कि वर्तमान में खरबों डॉलर से भी अधिक हो सकता है, यदि वर्तमान मुद्रा में बदला जाए।ताजमहल को सम्पूर्ण भारत एवं एशिया से लाई गई सामग्री से निर्मित किया गया था। 1,000 से अधिक हाथी निर्माण के दौरान यातायात हेतु प्रयोग हुए थे। पराभासी श्वेत संगमरमर पत्थर को राजस्थान मकराना से लाया गया था, जैस्पर को पंजाब से, हरिताश्म या जेड एवं स्फटिक या क्रिस्टल को चीन से। तिब्बत से फीरोजा़, अफगानिस्तान से लैपिज़ लजू़ली, श्रीलंका से नीलम एवं अरबिया से इंद्रगोप लाए गए थे।

कुल मिला कर अठ्ठाइस प्रकार के बहुमूल्य पत्थर एवं रत्न श्वेत संगमर्मर में जडे. गए थे।उत्तरी भारत से लगभग बीस हजा़र मज़दूरों की सेना अन्वरत कार्यरत थी। बुखारा से शिल्पकार, सीरिया एवं ईरान से सुलेखन कर्ता, दक्षिण भारत से पच्चीकारी के कारीगर, बलूचिस्तान से पत्थर तराशने एवं काटने वाले कारीगर इनमें शामिल थे। कंगूरे, बुर्जी एवं कलश आदि बनाने वाले, दूसरा जो केवल संगमर्मर पर पुष्प तराश्ता था, इत्यादि सत्ताईस कारीगरों में से कुछ थे, जिन्होंने सृजन इकाई गठित की थी।

कुछ खास कारीगर, जो कि ताजमहल के निर्माण में अपना स्थान रखते हैं, वे हैं:

  • मुख्य गुम्बद का अभिकल्पक इस्माइल जो कि ऑट्टोमन साम्राज्य का प्रमुख गोलार्ध एवं गुम्बद अभिकल्पक थे।
  • फारस के उस्ताद ईसा एवं ईसा मुहम्मद एफेंदी जो की ईरान से थे,ऑट्टोमन साम्राज्य के कोचा मिमार सिनान आगा द्वारा प्रशिक्षित किये गये थे, इनका बार बार यहाँ के मूर अभिकल्पना में उल्लेख आता है।
  • बेनारुस, फारस (ईरान) से ‘पुरु’ को पर्यवेक्षण वास्तुकार नियुक्त किया गया एवं का़जि़म खान, लाहौर का निवासी, ने ठोस सुवर्ण कलश निर्मित किया।
  • चिरंजी लाल, दिल्ली का एक लैपिडरी, प्रधान शिलपी, एवं पच्चीकारक घोषित किया गया था।
  • अमानत खाँ, जो कि शिराज़, ईरान से था, मुख्य सुलेखना कर्त्ता था। उसका नाम मुख्य द्वार के सुलेखन के अंत में खुदा और मुहम्मद हनीफ, राज मिस्त्रियों का पर्यवेक्षक था, साथ ही मीर अब्दुल करीम एवं मुकर्‍इमत खां, शिराज़, ईरान से; इनके हाथिओं में प्रतिदिन का वित्त एवं प्रबंधन था।

ताजमहल के निर्माण में कितना समय लगा?

मोहब्बत की मिसाल माने जाने वाले ताजमहल का निर्माण काम करीब 23 साल के लंबे समय के बाद पूरा हो सका था। सफेद संगममर से बने ताजमहल की नक्काशी और सजावट में छोटी-छोटी बारीकियों का ध्यान रखा गया है। यही वजह है निर्माण के इतने सालों बाद आज भी ताजमहल की खूबसूरती बरकरार और यह दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक है।

आपको बता दें कि  मुगल बादशाह शाहजहां ने ताजमहल का निर्माण  1632 ईसवी में शुरु किया था, लेकिन इसका निर्माण काम 1653 ईसवी में पूरा हुआ था।मुमताज के इस बेहद खास मकबरे को बनाने का काम वैसे तो 1643 ईसवी में ही पूरा कर लिया गया था, लेकिन इसके बाद वैज्ञानिक महत्व और वास्तुकला के हिसाब से इसकी संरचना को बनाने में करीब 10 साल और ज्यादा लग गए थे, इस तरह दुनिया की यह भव्य ऐतिहासिक धरोहर 1653 ईसवी में पूरी तरह बनकर तैयार हुई थी।

ताजमहल को बनाने में हिन्दू, इस्लामिक, मुगल समेत कई भारतीय वास्तुकला का समावेश  किया गया है।उत्तरप्रदेश के आगरा में स्थित इस भव्य और शानदार इमारत को करीब 20 हजार मजदूरों ने मुगल शिल्पकार उस्ताद अहमद लाहैरी के नेतृत्व ने बनाया था। हालांकि, ताजमहल को बनाने वाले मजदूरों से संबंधित यह मिथ भी जुड़ा हुआ है कि, ताजमहल का निर्माण काम पूरा होने के बाद मुगल शासक शाहजहां ने सभी कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे।ताकि दुनिया में ताजमहल जैसी अन्य इमारत नहीं बन सके। वहीं ताजमहल के दुनिया के सबसे अलग और अद्भुत इमारत  होने के पीछे एक यह भी बड़ा कारण बताया जाता है।

पर्यटन के दृष्टिकोण से ताजमहल बहुत ही प्रमुख भूमिका निभाता है जिसका सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है, कई लोगों की रोज़गार का साधन है ताजमहल साथ ही विश्वभर में भारत को एक नयी पहचान ताजमहल के 7 आश्चर्यों में शामिल होने के बाद मिली.

यह भी देखें 👉👉 CAG of India – भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक कौन हैं?

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